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मकड़ियाँ दिलों की

बड़ी शिद्दत से इनकी आवाजाही रंग लायी है,
किसी का न तिलक और न कहीं कोई सगाई है,
सफ़ाई रोज़ होती है, हठी ये गिर कर पलती है,
मगर फिर भी दीवारों पर मेरे चुपचाप चलती है,
मकड़ियाँ हैं दिलों की ये, दिलों की बात सुनती हैं, 
मेरे कमरे के कोनों पर अभी भी ज़ाले बुनती हैं

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Comment by neeraj tripathi on April 26, 2011 at 9:38am
dhanyavaad baagi ji...kripya ek nazar meri kavita 'ab apni pehchan likhunga' par bhi daliye.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 26, 2011 at 8:57am

नीरज भाई, जरा संभल कर, कही जालों में उलझ न जाइएगा, :-)

अच्छी रचना आभार |

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