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प्यार की वैज्ञानिक व्याख्या

क्या?
प्यार की वैज्ञानिक व्याख्या चाहिए
तो सुनो
ब्रह्मांड का हर कण
तरंग जैसा भी व्यवहार करता है
और उसकी तरंग का कुछ अंश
भले ही वह नगण्य हो
ब्रह्मांड के कोने कोने तक फैला होता है

आकर्षण और कुछ नहीं
इन्हीं तरंगों का व्यतिकरण है
और जब कभी इन तरंगों की आवृत्तियाँ
एक जैसी हो जाती हैं
तो तन और मन के कम्पनों का आयाम
इतना बढ़ जाता है
कि आत्मा तक झंकृत हो उठती है
इस क्रिया को विज्ञान अनुनाद कहता हैं
और आम इंसान
प्यार

इसलिए अगर सच्चा प्यार चाहिए
तो शरीर नहीं
आवृत्ति मिलाने की कोशिश करो
मगर यह काम
जितना आसान दिखता है
उतना है नहीं
क्योंकि हो सकता है
कि जिससे तुम्हारी तरंगों की आवृत्ति मिले
वो पत्थर हो, पेड़ हो
अथवा
वो इस धरती पर हो ही नहीं

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 15, 2011 at 3:06pm
वंदना जी, बागी जी, विनय जी एवं अरुण जी रचना पसंद करने के लिए आप सबका धन्यवाद।
Comment by vinay sharma on May 13, 2011 at 3:56pm

aap ne bahut pyar se pyar ki paribhasa kahi hai

 

 

Comment by vinay sharma on May 13, 2011 at 3:55pm
lagata hai aap physics ke professor hai , aap ko pata hai bina pyar me pade koi quantum physics ko nahi samajh sakata hai
Comment by Abhinav Arun on May 13, 2011 at 1:15pm
बहुत बढ़िया धर्मेन्द्र जी ये प्यार का वैज्ञानिक पहलू भी खूब है ! अच्छी और रोचक रचना के लिये बधाई !!

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 13, 2011 at 9:56am

बहुत खूब धर्मेन्द्र जी, प्यार के पीछे छुपे वैज्ञानिक रहस्य को ढूंढने की कोशिश है यह रचना, सच ही तो कहा है कि प्यार एक अनुनाद है , जब तक दो फ्रीक्वेंसी मैच नहीं होंगे, प्यार होना मुश्किल है |

बधाई धर्मेन्द्र भाई |

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