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बेवफ़ाओं से दोस्ती

मुझसे तन्हाई मेरी ये पूछती है,

बेवफ़ाओं से तेरी क्यूं दोस्ती है।

 

चल पड़ा हूं मुहब्बत के सफ़र में,

पैरों पर छाले रगों में बेखुदी है।

 

पानी के व्यापार में पैसा बहुत है,

अब तराजू की गिरह में हर नदी है।

 

एक तारा टूटा है आसमां पर,

शौक़ की धरती सुकूं से सो रही है।

 

बिल्डरों के द्वारा संवरेगा नगर अब,

सुन ये, पेड़ों के मुहल्ले में ग़मी है।

 

हां अंधेरों का मुसाफ़िर चांद भी है,

चांदनी के ज़ुल्फ़ों की आवारगी है।

 

अब खिलौनों वास्ते बच्चा न रोता,

टीवी के दम से जवानी चढ गई है।

 

दिल की कश्ती को किनारों ने डुबाया,

इसलिये मंझधार से मिलने चली है।

 

मत लगाना हुस्न पर इल्ज़ाम दानी,

ऐसे केसों में गवाहों की कमी है।

--

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Comment by Dr. Sanjay dani on June 4, 2011 at 11:31pm
Thanks Yograj Prabhakar ji.

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 4, 2011 at 12:11pm
//पानी के व्यापार में पैसा बहुत है,

अब तराजू की गिरह में हर नदी है।//

 

वाह वाह वाह डॉ दानी साहिब, ये कमाल का शेअर कहा है आपने ! दाद कबूल फरमाएं !

 

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