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गजल-आंखों में उल्फत का अंजन लगाईए

गजल

आंखों में उल्फत का अंजन लगाईए।
टूटते हुए रिश्तों पे बंधन लगाईए।।


गर जज्बातो में नफरत की बू आये तो।
ऐसे सवालातों पे मंजन लगाईए।।


जब कभी जुल्मो-सितम हद से गुजर जाये।
तब अम्न के लिये जानो-तन लगाईए।।


लेने के बदले कुछ देना भी सिखिये।
हर जगह मुफ्त का ना चंदन लगाईए।।


जब रंजों-गम से दिल चंदन बेकरार हो जाये।
तब अंतस में धुन अलख निरंजन लगाईए।।

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Comment

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 4, 2011 at 11:54am

बहुत सुंदर शेवर कहे हैं आपने पूनिया साहिब - बादही स्वीकार कीजिए !  मन्दर्जा शेअर दिल को छू लेने वाला है :

//जब कभी जुल्मो-सितम हद से गुजर जाये।
तब अम्न के लिये जानो-तन लगाईए।।//

Comment by nemichandpuniyachandan on June 3, 2011 at 10:11pm
Shreemaan Ganesh gee "Bagi" sahib,Aapke dwaraa housala-afzai ke liye bahut-bahut dhanyead.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 3, 2011 at 9:50pm
चन्दन साहिब , बहुत ही खुबसूरत और बुलंद ख्यालात है , सभी शे'र कहन की कसौटी पर खरे है , बहर की समस्या परिलक्षित है , बधाई स्वीकार करे |

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