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लौट के आये उड़ान से - ग़ज़ल

दिन-भर जो बात करते रहे आस्मान से
सूरज ढला तो लौट के आये उड़ान से

था वक़्त का ख़याल या हारे थकान से
निकले थे घर से सुब्ह जो अपने गुमान से

आसां नहीं बुलन्दी को छूना, ये है फ़लक
गुज़री हर एक राह तो मुश्किल चढ़ान से

टूटे हुए सितारों से हो किसको वास्ता
निस्बत रही सभी को फ़क़त आस्मान से

खामोशियों से करते हैं हालत मेरी बयां
आँखों से बहते अश्क मेरे बेजुबान-से

जब मग़रिबी हवाओं से मुरझा गया चमन
कैसे रखें उमीद किसी नौजवान से

बदलेंगे ज़िन्दगी तेरे हालात एक दिन
बदली हवा की चाल लगे कल-कलान से

जाने ये किस दयार के इन्सां हैं दोस्तो
जो मुफ़लिसी के हाल में जीते हैं शान से

चल 'जीत' ज़िन्दगी से सवाल आज हम करें
ताउम्र क्या मिला हमें हर इम्तिहान से

स्वरचित एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on February 16, 2019 at 6:16pm

ठीक है ।

'कल-कलान' का अर्थ क्या है ?

Comment by Jitendra sharma on February 16, 2019 at 5:09pm

आदरणीय Samar kabeer जी दोनों कवाफ़ी बदले है

एक बार देख लें।

Comment by Jitendra sharma on February 16, 2019 at 5:33am

जी बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर साहब।

Comment by Samar kabeer on February 15, 2019 at 4:27pm

जनाब जितेंद्र शर्मा जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'जो हौसला लिये थे चले आशियान से'

इस मिसरे में क़ाफ़िया दुरुस्त नहीं सहीह  शब्द है, 'आशियाना' देखियेगा  ।

'है लग रहा बदलती हवा के रुझान से'

इस मिसरे में भी क़ाफ़िया ग़लत है,सहीह शब्द है 'रुजहान' देखियेगा ।

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