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(एक) २१२/२१२/२१२/२१२ जब अंधेरों के आंगन उजाले गयेन्याय के भी बदल रोज पाले गये।१।*पांत से नीच कह जब निकाले गयेमस्जिदें उठ गयीं सब शिवाले गये।२।*झूठ को ताज देकर जगत में सभीसत्य दुत्कार घर से निकाले ग…
अनसुने अनकहे के बीच
क्यों दूर हो गए तुम , हमको सजा दिला के
चाहत के इशारे कभी हमको नहीं आते
मैं किसे तो याद करूँ कहो किसे भूलना पड़े है मुझे
लोग ही जब नजर को चुराते रहे
दोस्ती का हाथ हमसे भी
लापता मैं हो गया इक गुमशुदा के वास्ते
जो नाजुक दौर में हिलता रहा है
बद-नसीबी क्या कहें हम आज जो हालत हुई
कातिल मुझे तू शहर का कहते रहा तो है
आज कितनी यहाँ नर्म कमजोर है जिंदगी
तू मुझे धोका दे कम से कम मैं पछता तो सकूँ
कुंडलिया. . . . झोला
भाषा से भी बढ़ इक भाषा
गोस्वामी तुलसीदास जी के प्रति श्रद्धांजलि
सांकल मन के द्वार पर
हरिगीतिका छंद
दोहा पंचक - - - - शोखी
चौपाइयाँ
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दो गजलें- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
कातिल मुझे तू शहर का कहते रहा तो है
तू मुझे धोका दे कम से कम मैं पछता तो सकूँ
आज कितनी यहाँ नर्म कमजोर है जिंदगी
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मैं किसे तो याद करूँ कहो किसे भूलना पड़े है मुझे
क्यों दूर हो गए तुम , हमको सजा दिला के
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गोस्वामी तुलसीदास जी के प्रति श्रद्धांजलि
कुंडलिया. . . . झोला