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ओ बी ओ लखनऊ चैप्टर की साहित्य संध्या माह सितम्बर 2015 - एक संक्षिप्त रिपोर्ट

ओ बी ओ लखनऊ चैप्टर की साहित्य संध्या माह सितम्बर 2015 पर एक संक्षिप्त रिपोर्ट – डा0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव
शरद ऋतु की आहट लेते हुए माह सितम्बर के अंतिम शनिवार (26 -09 -2015) में जबकि हवाओं में हल्की सी खुनक आ गई थी, ओ बी ओ लखनऊ चैप्टर के सुधी योद्धा एवं महारथी सायं 4 बजे रोहतास एन्क्लेव में ‘साहित्य संध्या’ को फलीभूत करने हेतु पूरी प्रतिबद्धता से समवेत हुए I
उपस्थित सभी साहित्य अनुरागियों का स्वागत करते हुए संयोजक डा० शरदिंदु मुकर्जी ने कार्यक्रम के प्रथम चरण में अमेरिका स्थित SETI (search for extraterrestrial intelligence) नामक संस्था जो सुदूर ब्रह्मांड में जीवन की खोज करने के सामूहिक क्रिया-कलापों में प्राण-पण से लगी है, के उद्देश्य को प्रतिपादित करते हुए एक सार्वभौमिक प्रश्न उठाया कि – ‘क्या हम अकेले हैं ?’ अर्थात ब्रह्माण्ड के अन्य ग्रहों में भी जीवन है या मात्र अकेली पृथ्वी ही जीवनमय है I इसकी चर्चा करते हुए उन्होंने प्रोजेक्टर द्वारा बड़े परदे पर सर्वप्रथम इस पृथ्वी पर प्राप्त कुछ ऐसे चित्र दिखाए जो हजारों साल पुराने होने पर भी आधुनिक प्रगति को चुनौती देते लगते हैं जैसे उन तस्वीरो में हेलमेट जैसे किसी शिरस्त्राण का होना I फिर उन्होंने इंग्लॅण्ड में ऐम्स्बरी (Amesbury) से तीन किमी० पश्चिम और सेल्स्बरी (Salisbury) से तेरह किमी० उत्तर में स्थित विल्टशायर (Wiltshire ) में पाए जाने वाले प्रागैतिहासिक स्मारक स्टोन हेंज (Stonehenge) के चित्र दिखाए और एरिक फ़ॉन दैनिकेन (Erich von Däniken) की प्रख्यात पुस्तक Chariots of the Gods के बारे में बताया I यह पुस्तक अतीत के अनसुलझे रहस्यों का खुलासा करने का प्रयास करती है. इस पुस्तक में बताया गया है कि प्राचीन सभ्यताओं को बहुत सी तकनीक एवं धार्मिक दिशा-निर्देश दूसरे ग्रह से आये अन्तरिक्ष यात्रियों से मिले जिनका स्वागत यहाँ के लोगों ने देवता के रूप में किया I यह कार्यक्रम सेटी के प्रयासों पर रोशनी डालता हुआ इस निष्कर्ष पर समाप्त हुआ कि दूसरे ग्रहों में जीवन एवं उन्नत सभ्यताओं के होने की महती सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता.
साहित्य संध्या का दूसरा चरण डा0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव की अध्यक्षता में संचालक श्री मनोज कुमार शुक्ल ‘मनुज’ की वाणी-वंदना से प्रारम्भ हुआ और केवल प्रसाद ‘सत्यम’ ने गीतिका छंद से काव्यपाठ की शुरुआत की I इसके बाद उन्होंने कुछ दोहे सुनाये जिसके कुछ नमूने इस प्रकार हैं –
सच्चे मन से चाहते जाना भव के पार
बढे चलो मंझधार में नाम-नाव आधार

बित्ता भर की बांसुरी लिए ब्रह्म का ताव
बजती है सुन्दर सदा भरे कृष्ण का भाव

श्री विजय राज श्रीवास्तव ने माँ पर कुछ भावपूर्ण रचनाएं सुनाईं I खासकर एक ऐसी कविता जिसमे माँ की पीड़ा छलकती है कि उसका बेटा सामान्य बुद्धि का न होकर कुशाग्र बुद्धि क्यों हुआ क्योंकि यदि वह सामान्य बुद्धि वाला होता तो विदेश में जाकर न बसता और कम से कम पास तो रहता I बुढ़ापे की आती तो बनता I फिर उन्होंने ‘तरक्की की दूकान’ एक व्यंगात्मक कविता का पाठ कुछ इस प्रकार किया –
गर्द औ गुबार से
सराबोर हैं हवाएं
शोरगुल के बाजार में
तरक्की की दूकान हैं लगाये
सिसकती नदियों के सामने
बन रही अट्टालिकाएं
गर्द औ गुबार से
सराबोर हैं हवाएं
डा0 सुभाष चन्द्र गुरुदेव ने मौजूदा हालात पर एकाधिक प्रासंगिक कवितायेँ सुनाईं , जिनमें सबसे प्रभावशाली रचना थी –‘आदमी हैवान बनता जा रहा है ‘ i इस कविता की कुछ बानगी इस प्रकार है –
हर तरफ अब होड़ सी लगने लगी है
ईंट गारे के जंगल हर गली हैं
कौन किसका घर कहीं से खोद पाए
कौन किसको किस तरह नीचा दिखाए
बस यही संताप डसता जा रहा है
आदमी हैवान बनता जा रहा है
साहित्य संध्या के मध्य अचानक कुंती जी के अस्वस्थ हो जाने से कार्यक्रम अधिक संवेद्य हो गया i उन्हें तत्काल विश्राम दिया गया किन्तु वह फिर कार्यक्रम में प्रतिभाग नहीं कर सकीं I डा0 शरदिन्दु मुकर्जी इस विपरीत स्थिति में भी हमारे साथ रहे I उन्होंने कुछ सुन्दर अतुकांत रचनायें सुनाईं I उनकी कविताओं में एक अद्भुत जीवन शैली की छाप दिखती है जो उनके व्यक्तित्व का भी एक आइना है I उदाहरणस्वरुप उनकी कविता ‘जन्म दिन ‘ का एक अंश प्रस्तुत किया जा रहा है –
नक्षत्र खचित अम्बर में
किसके उज्ज्वल स्नेह का प्रकाश ?
किसके इंगित पर मुस्काते हैं
यह धरती और आकाश?
किसके सौरभ से सुरभित होता है यह मन !
अश्रु शिशिर
नहीं क्रंदन !
किसके कर में क्रीड़ा करते
जीवन-मरण
मरण-जीवन
उसको अर्पित हो तन-मन
उसको अर्पित हो जीवन
हिन्दी की कवयित्रियों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने वाली श्रीमती संध्या सिंह ने अपनी सुन्दर उपमाओं और मोहक बिम्बों से सभी को आप्यायित किया i उनका एक मुक्तक प्रस्तुत किया जा रहा है –
मंजिल खेले आँख मिचौली
छूटे फिसल-फिसल कर
हमने पैरों को बहलाया
रस्ते बदल-बदल कर
संचालक मनोज कुमार शुक्ल ‘मनुज’ ओज के कवि हैं i उनकी कविता में ‘उत्साह’ स्थाई-भाव लिये रहता है i उनकी कविता की एक बानगी इस प्रकार है
अरे ! तोड़ पत्थर को पानी निकालो
जो चाहोगे निश्चित ही पाकर रहोगे
जो क्षमता है उसको झिन्झोड़ो जगाओ
तो बंजर में पौधे उगाकर रहोगे
अंत में अध्यक्ष डा0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव ने कुछ लघु कथाएँ सुनायी और अपनी कविता ‘हृदयाग्नि’ का पाठ किया, जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं –
आत्म पीड़ा में अनुभूति सुख की लिए
दग्ध होता रहा अनुभवों में सदा
सत्य ही उस करुण के हृदय कोष में
पल रहा कोई जीवंत अनुराग है

मृत्यु आती नहीं चैन मिलता नहीं
युद्ध होता है विष-चेतना में प्रबल
दंश लेता है जब फिर न देता लहर
क्रुद्ध फुंकारता नेह का नाग है
साहित्य संध्या का समापन डा0 शरदिंदु मुकर्जी ने आगत साहित्य अनुरागियों के प्रति आभार प्रदर्शन के साथ किया I

 

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