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हिन्दी में क्षेत्रीय भाषाओँ के शब्द जोड़े जाएँ या नहीं ? // शशि बंसल

हिन्दी में क्षेत्रीय भाषाओँ के शब्द जोड़े जाएँ या नहीं ?
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भारत देश एक बहुभाषी राष्ट्र है। जहाँ अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा के अतिरिक्त अनेक प्रकार की भारतीय भाषाएँ , उपभाषाएँ , आंचलिक भाषाएँ , बोलियाँ , उपबोलियाँ आदि बोली जाती हैं। हिंदी सहज , सरल एवं वैज्ञानिक भाषा है ,जिसने बिना किसी भेदभाव और पूर्वाग्रह के उदारता का परिचय देते हुए अपनी वैज्ञानिकता को क्षति पहुँचाए बिना सहज ही समस्त विदेशी , देशी , आगत , तत्सम आदि शब्दों को अपने भीतर सुगंध की तरह समा लिया है। वासुदेवशरण अग्रवाल ने कहा है कि --" हिन्दी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है , जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।" सरलता से कहें तो हिन्दी उस माँ की तरह है जो अपने पुत्र के मित्रों को भी वही स्नेह और सम्मान देती है। वह अपने - पराये का भेद नहीं करती। अब प्रश्न यह है कि अन्य भाषा के शब्द हिंदी के लिये आशीर्वाद है या अभिशाप ? मेरी दृष्टि में तो ये किसी आशीर्वाद से कम नहीं है।

पृथ्वी पर ऐसी कौन सी वस्तु है जो मूल रूप में है , सभी भाषाएँ परिवर्तन के दौर से गुजर रही हैं। फ़ारसी , जर्मनी , फ्रेंच , अंग्रेजी आदि सभी विकसित , विस्तृत भाषाओ ने भी दूसरी भाषाओं के शब्दों को निःसंकोच अपना लिया है तो फिर ,हिन्दी भाषा में अन्य भाषा के शब्दों के उपयोग को लेकर दुराग्रह क्यों ? आज अन्य भाषा के शब्दों में विशेषकर अंग्रेजी भाषा के शब्दों का विरोध अधिक होता है। जबकि उसको बोलने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अंग्रेजी ने तमाम भाषाओं से शब्द ग्रहण कर अपना विस्तार किया है , शब्दकोष को बढ़ाया है।जिसका परिणाम सबके समक्ष है। "उदाहरण आप सभी प्रबुद्ध वर्ग जानते हैं , शब्द की उत्पत्ति एवं विकास के ज्ञान के विषय में मेरा ज्ञान आपके ज्ञान की तुलना में क्षीण है।" साहित्य के क्षेत्र में तो सदैव ज्ञान का आदान - प्रदान होता रहता है , उसी से भाषा में व्यापकता भी आती है। पारस्परिक संपर्क के कारण सभी भाषाएँ अन्य भाषाओँ के शब्दों को स्वीकार कर लेती है। जो शब्द सहजता व सरलता के साथ अन्य भाषाओं से जुड़ते चले जाते हैं वे उसका हिस्सा बन जाते हैं और निश्चित ही भाषा के शब्दकोष में बढ़ोतरी करते हैं , अगर यही प्रयोग हिन्दी भाषा के साथ भी हो रहा है तो गलत क्या है ? यदि हम चाहते हैं कि कोई भी भाषा चिरंजीवी बनी रहे तो इसके लिए आवश्यक है कि वह मूल स्वरुप खोये बिना प्रयोगात्मक नए शब्द शामिल करे।

भाषा की समृद्धि में उस भाषा द्वारा अन्य भाषाओं के शब्दों को अंगीकृत करने की शक्ति का अपना महत्त्व है। भाषा की उन्नति व वर्धन के लिए उसका सर्वगाह्य होना आवश्यक है। यदि परिस्थिति व परिवेश के अनुसार अन्य भाषा के शब्द प्रयोग किये जाते हैं तो वे अभिशाप न बनकर वरदान बन जाते हैं। पानी बहे नहीं तो वह सड़ जाता है। मैं भाषा की शुद्धता को विद्यमान रखने के विरुद्ध नहीं हूँ पर क्या हम शुद्ध सोना पहन सकते हैं ? नहीं न। फिर जिस देश की " टेग - लाइन " ही हो - " कोस-कोस पानी बदले , कोस-कोस बानी ",वहाँ हम हिन्दी की शुद्धता की बात कैसे कर सकते हैं ?क्या ऐसा सकता है कि तीव्र वेग से बहती नदी अपने मार्ग में आने वाली कोमल वनस्पतियों को बहा कर न ले जाये ? क्या वे उसके प्रवाह में बाधक हैं ? क्या इससे नदी की सुंदरता में वृद्धि नहीं होती ? हिन्दी भाषा इतनी कमजोर नहीं कि वह चंद देशी-विदेशी शब्दों के प्रवेश से लड़खड़ा जाये। पाठकों की रूचि, भाषा के प्रवाह और उसकी सर्वगाह्यता को बनाये रखने के लिए आम प्रचलित शब्दों का प्रयोग कतई अनुचित नहीं है। जितने नए-नए शब्दों को हिंदी भाषा का प्रश्रय मिलता जायेगा उतना ही वह सर्वगाह्य हो नए लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करती जायगी। यदि हम शुद्धिकरण की जिद लेकर बैठ गए और कठोर नियमों की बेढ़ियों में जकड़ते चले गए तो हिन्दी का हश्र भी संस्कृत भाषा के समान हो जायेगा जो आज मृतप्राय है।

अंग्रेजी भाषा के अधिक प्रयोग के कारण कहा जाता है कि भारतीय आज एक नई भाषा " हिंग्लिश " का प्रयोग कर रहे हैं। मैं पूछना चाहती हूँ कि फिर क्यों नहीं हमने बोलियों , उपभाषाओं के शब्दों के प्रयोग पर उसे भी नई भाषा के नाम से सुशोभित कर दिया ? माफ़ी चाहते हुए कहूँगी कि साहित्यकार अपनी रचनाओं में अलग-अलग परिवेश व देशकाल के अनुसार पात्र की भाषा प्रयोग करते हैं जो कि रूचि , प्रवाह व रचना को यथार्थ रूप देने के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि इसके स्थान पर शुद्ध हिन्दी भाषा का प्रयोग किया जाये तो फिर साहित्य आगे बढ़ पायेगा उससे अधिक से अधिक पाठक जुड़ पाएंगे ?क्या इस तरह से हम प्रेमचंदजी को कठघरे में नहीं खड़ा कर देते हैं ? क्यों उन्हें हम हिन्दी साहित्य में उपन्यास सम्राट की उपाधि दिए हुए हैं ? उन्होंने ठेठ देहाती और उर्दू शब्दों का प्रयोग नहीं किया ? क्या हम फणीश्वरनाथ रेणु के लिए भी प्रश्नचिन्ह खड़ा नहीं करते हैं जो आंचलिक भाषा के शब्दों का प्रवीणता के साथ प्रयोग करके जन-जन तक पहुंचे ? महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका के सम्पादक रहते हुए हमेशा लेखकों की भाषा को सरलीकृत करते हुए उसे अधिसंख्यक साधारण पाठकों की समझ आने लायक बनाया बिना ये सोचे कि वह शब्द अरबी का है , फ़ारसी का है या अंग्रेजी का। वे सदैव पाठकों की रूचि का ध्यान रखते थे । क्या इन सब को हिन्दी भाषा से इतर दूसरी भाषा का समझा जाये ? या उनके लेखन से हिन्दी साहित्य समृद्ध नहीं हुआ ? सत्य तो यह है कि हिन्दी भाषा का कभी भी अन्य भाषाओं से कभी कोई संघर्ष नहीं रहा।

शुद्ध हिंदी की गरिमा को नकारा नहीं जा सकता है। प्रबुद्ध वर्ग कहता है कि हिन्दी भाषा समृद्ध है। उसे अन्य किसी भाषा के शब्दों की आवश्यकता नहीं। इससे भाषा में विकृति आती है , माना। पर ये भी कटु सत्य है कि अत्यधिक शुद्धिकरण वास्तव में अंग्रेजीकरण का सबसे बड़ा सहायक है। यदि सभी भाषा - भाषी शुद्धिकरण प्रक्रिया को गाँठ की तरह बाँध लेंगे तो इससे पहले भाषाओं के बीच और फिर लोगों के बीच खाई बढ़ती जाएगी और सभी भाषाएँ सिमटकर रह जाएँगी। यही नियम हिन्दी भाषा पर भी लगता है। इस सहज प्राकृतिक प्रक्रिया को रोका गया तो यह हिन्दी भाषा के लिए आत्मघाती कदम होगा। उसके विस्तार में बाधक होगा। भली-भांति जानती हूँ कि भाषा क्षेत्र के विकास से जुड़ा प्रबुद्ध वर्ग इस तरह के प्रयोगों के विरुद्ध है। उनके अनुसार इस तरह हिन्दी अपना मूल स्वरुप खो देगी . इसी तरह नई -नई भाषा के शब्द जुड़ते रहेंगे तो एक दिन हमारे सामने एक बिलकुल नई भाषा होगी। इसके लिए विकल्प तो बहुत दिए गए हैं पर उनमे से कितनों ने मूर्त रूप लिया है ?युद्ध स्तर पर भी प्रयास किया जाएँ तो भी हम हिन्दी भाषा से अन्य भाषा के शब्द नहीं हटा सकते। क्यूंकि हिन्दी में शुद्धिकरण के कारण रिक्तियां पैदा होती गई। लोगों ने अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार समझ आने वाले शब्द भर दिए बिना ये सोचे कि वे किस भाषा से सम्बन्ध रखते हैं। जिस देश का इतिहास अनेक आक्रमणकारियों से दमित रहा है उस देश में भाषा का प्रभाव ना पड़े यह कैसे हो सकता है ? अब आप इसे विडम्बना कहे या मजबूरी मेरी नज़र में ये वरदान ही है। अन्य भाषा के शब्दों को अपने स्वरुप में ढालना एक बहुत बड़ी कला है। आज ये शब्द दूध-पानी की तरह एक हो गए हैं। हिन्दी ने इन शब्दों को सहर्ष शिरोधार्य कर लिया है . अगरचे आप इसे संकीर्णता से ऊपर उठकर देखेंगे तो आपको भी इसकी पवित्रता व मीठेपन का अहसास होगा। भारतीय संस्कृति " अतिथि देवो भव "और " वसुधैव -कुटुंबकम " की रही है जैसे एक परिवार की व्यावहारिकता और प्रशंसा का मानक उसके यहां आने वाले आगंतुकों - अतिथियों से माना जाता है वैसी ही उदारता हिन्दी को आगे भी जारी रखनी होगी। इसे अवगुण न समझकर वरदान समझना होगा क्यूंकि आज हिन्दी में रच बस गए अनगिनत शब्द इतने अपने हो चुके हैं कि उनके बिना हिन्दी सूनी हो जाएगी। मैं तो कहूँगी कि इसे हिन्दी भाषा के नए स्वरुप में स्वीकार लिया जाये। माना जाये कि वह आधुनिक और पारम्परिक आभूषणों से सजी ऐसी दुल्हन है जिसकी सुंदरता व पवित्रता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता।

हिन्दी की शुद्धता को लेकर तर्क दिए जाएँ परन्तु कोई ये बताये कि नई पीढ़ी शुद्ध व्याकरण वाली हिन्दी सीखे कहाँ से। अंग्रेजी माध्यमों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं सरकारी पाठशालाओं की स्थिति जग जाहिर है। जो हिन्दी के ज्ञाता हैं वे अधिकांशतः लेखन आदि कार्य से जुड़े हुए हैं . कुशल शिक्षकों के अभाव में बताइये भला किस मार्ग से आप शुद्ध हिन्दी प्रचारित - प्रसारित करेंगे ?दूरसंचार के समस्त माध्यमों ने वैसे भी भाषा की एक नई परिभाषा गढ़ दी है। प्रत्येक भाषा में अन्य भाषा के शब्द शुद्ध व विकृत रूप में आ गए हैं जिन्हें उनकी सरलता और बोधगम्यता के कारण अपना लिया गया है। अब हमारे पास पीछे मुढ़कर देखने का समय नहीं है। यदि हम चाहते हैं हिन्दी भाषा आगे बढे तो ख़ुशी-ख़ुशी उसे अपने अंदर सहजता से आये दूसरी भाषा के शब्दों के साथ आगे बढ़ने देना चाहिए उसके मार्ग में अनावश्यक रुकावट नहीं डालना चाहिए। अधिक से अधिक युवाओं को हिन्दी भाषा से जोड़ने के लिये और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने के लिये हमें कूपमंडूकता से ऊपर उठना ही होगा। इससे न हिन्दी भाषा की प्रगति रुकेगी और न विकास। बल्कि इस कदम से ये अंतर्राष्ट्रीय महत्तव की भाषा हो जाएगी। संसार में ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती है। जो लोग हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों विशेषकर अंग्रेजी से नाखुश हैं मैं पुनः हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए पूछना चाहूँगी क्या उनके पुत्र - पुत्री हिन्दी माध्यम से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं ? क्या उनकी संतति भी उनकी तरह भाषा शुद्धता अभियान को आगे बढ़ा पायेगी ? अपवाद छोड़ दिए जाएँ तो उत्तर सबको पता है। जब सब कुछ देश काल वातावरण की बाध्यता है तो फिर हिन्दी की शुद्धिकरण की तटस्थता को त्याग यहाँ भी उदार होना ही पड़ेगा।

वैश्वीकरण का दौर है। हिंदी के समक्ष भी बहुत अधिक चुनौतियाँ हैं। आज उसे फ़ैलाने से ज्यादा बनाये रखना आवश्यक है और ये कोई बहुत आसान कार्य नहीं है। जब लाखों शब्दों को बाहर से लेने पर भी अंग्रेजी का स्वरुप बिगड़ने के स्थान पर दिन ब दिन बढ़ रहा है तो हम हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों को लेकर क्यों विचलित हो रहे हैं ? डर रहे हैं ? अंग्रेजी ने शायद ही कोई भाषा हो जिससे कुछ न कुछ लिया ना हो। इस तरह तो हम हिंदी का समस्त क्षेत्रीय भाषाओं से भी वैमनस्य बढ़ा देंगे। यदि हिंदी को बाजारीकरण से परे भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से ज़माना है तो अन्य भाषा के शब्दों को जो सहज ही आते चले जा रहे हैं उनको तिरस्कृत करने से बचना होगा। एकला चलो की नीति छोड़नी होगी , नहीं तो हिंदी को सिमटने में देर नहीं लगेगी।

क्षमा चाहती हूँ हिंदी भाषा के शिक्षाविदों से, इस आलेख में यदि कोई तकनीकी गलती कर बैठी हूँ , या कोई तथ्य गलत दे बैठी हूँ तो कृपया, मुझे अल्पज्ञानी समझकर क्षमा करें व मेरा मार्गदर्शन करें ।धन्यवाद ।

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