For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

हिंदी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह अपनी एक कविता मे "जाना क्रिया" को सबसे खतरनाक मानते हैं । हरेक आदमी अपने अनुभव के आधार पर लिखता है इसीलिये केदारजी की बात सही होगी । मगर मैं अपने अनुभव से कहता हूँ कि "पढ़ना क्रिया" सबसे कठिन है।


ये मेरा अनुभव है, और यह सही है । इसके पुष्टि के लिये एक उदाहरण दे रहा हूँ। मानिये किसी को अगर कहीं जाना है और मन के हिसाब से साधन नहीं मिला, तो मजबूरी में वह दूसरे साधन को अपना सकता है और कोई दूसरा उस पर आक्षेप भी नहीं कर सकता है। हवाई जहाज से यात्रा करने वाला मजबूरीवश रेल या बस से भी यात्रा कर सकता है। या, मानिये कि कोई इस दुनिया से चला जाना चाहता हो । तो जहर खाने के बदले रेल से भी कूद भी सकता है, गले में पत्थर बाँध कर तलाब में जा सकता है। मगर पढ़ने में विकल्प की ऐसी सुविधा नहीं है।

अगर आप को लगता है कि मैं श्लील-अश्लील किताबों की बातें करूँगा तो आप गलत हैं । मेरा अनुभव कहता है कि श्लील किताबों को पढ़ने में ही सबसे दिक्कत होती है। कई ऐसी सच्ची घटनाएँ हैं जिनके अनुसार कोई बच्चा धार्मिक किताब पढ़ना शुरू करता था तो उसके माँ-बाप को चिन्ता होने लगती थी, कि यह साधू तो न बन जायेगा। और फिर कम उम्र मे ही शादी का जुगाड़ होने लगता था। अगर कोई शादीशुदा आदमी पढ़ना शुरू करता तो उसकी पत्नी सबसे अधिक चिंतित हो जाती थी । स्थिति कुछ बदलावों के साथ आज भी वही है ।  इसीलिये मेरा अनुभव कहता है कि ’पढ़ना’ सबसे खतरनाक क्रिया है । बहुत-से आदमी यही नहीं समझ पाते कि मैं क्यों पढ़ रहा हूँ, क्या पढ़ रहा हूँ ? पढ़ना क्रिया की यही जटिलता उसे सबसे खतरनाक बनाती है। आगे बढ़ने से पहले यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि केदारजी जिस ’जाना’ की बात कर रहे हैं, वह प्रेम के संदर्भ में है और मैं जिस पढ़ने की बात कर रहा हूँ वह कोर्स के बाहर की किताबें पढ़ने की हैं ।

अब दूसरे प्रसंग पर- मान लीजिये किसी ने तय कर ही लिया कि मुझे पढ़ना है तो पहला सवाल उठता है कि क्या पढ़े ? और उत्तर में बहुत सारे विकल्प आ जाते हैं । अगर विकल्प बिना किसी सरकारी सहायता के पढ़ने का है, तो संभव है कि सारे के सारे विकल्प खुले हुए सामने आ जायें । अगर विकल्प खुला है, तो उसमे एक नाम नीरज गोस्वामी जी की गजल संग्रह "डाली मोगरे की" का जरूर होगा। अब यह विकल्प किसी के लिये बुरा भी हो सकता है तो किसी के लिये अच्छा भी। मगर विकल्प में सबके साथ यह भी आयेगा ।

मैं यहाँ सिर्फ विकल्प की बात कर रहा हूँ। मान लीजिये, किसी को बुखार हुआ है, तो पेरासिटामोल भी दिया जा सकता है और कोबिफ्लाम भी । दोनों मे से कोई भी एक बुखार को ठीक कर सकता है। इसी तरह अगर किसी को पढ़ने की बीमारी हो गई तो "डाली मोगरे की" भी पढ़ी जा सकती है और मानसिक उताप को शांत कर सकता है। वैसे मैं कोई दावा नहीं कर रहा हूँ सिर्फ विकल्प की बातें कर रहा हूँ। मेरा एक अनुभव यह भी रहा है कि दावा अधिकत्तर उसी चीज की होती है जो कमजोर या खराब होती है । जैसे हर दवा का कोई ना कोई फार्मूला होता है उसी तरह "डाली मोगरे की" नामक गजल संग्रह में भी बहुत सारे फार्मूले है जिसमें से कुछ नीचे दिये जा रहे हैं-- 

 
तय किया चलना जुदा जब भीड़ से
हमर नज़र देखा सवाली हो गई है
 
मुश्किलों की यही हैं बड़ी मुश्किलें
आप जब चाहें कम हो तभी ये बढ़ें
 
जिंदगी में तब झमेला हो गया
नीम तुम और मैं करेला हो गया
 
चाहते मेमने सी भोली है
पर जमाना बड़ा कसाई है
 
साथ जब तक चले लगे अपनी
साँस होती मगर पराई है
 
जो रब दें मंजूर हमें
हम तो हैं कशकोल मियाँ
 
अभी तक भगवान के सामने सभी ने अपने को भिखारी कहा है मगर नीरज जी ने अपने आप को भिक्षापात्र कहा। अब सवाल है कि वह भिखारी कौन है जिसके हाथ में शाइर भिक्षापात्र बन कर रह गया? यह काफी परेशान करना वाला , मन को मथने वाला शेर है।
 
चाह तुझको नहीं है पाने की
खासियत ये तेरे दिवाने की
 
सारी खुशियों को लील जाती है
दौड़ सबसे अधिक कमाने की
 
और अंत में मुहावरों से आत्मा चुरा कर नीरज जी ने अपना यह शेर जीवित कर लिया--
 
छुपायें हुए हैं वही लोग खंजर
जो कहते किसी से अदावत नहीं है
 
इस संग्रह में इस तरह के और भी फार्मूले हैं। जिससे आप परिचय प्राप्त कर सकते हैं। यहाँ फिर याद दिला दूँ कि मैं सिर्फ विकल्प की बात कर रहा हूँ। और अगर इस विकल्प से किसी का मन तृप्त हुआ तो उसका अगला प्रश्न होगा कि इसी तरह के और भी कितने विकल्प हैं? और पहले ही की तरह बहुत सारे उत्तर। यहाँ किसी विकल्प की बात करने से पहले विविध भारती रेडियो स्टेशन से प्रसारित कार्यक्रम "बाइस्कोप की बातें" का जिक्र कर दूँ। पहले यह कार्यक्रम हर शुक्रवार को शाम के चार से पाँच बजे तक आता था। मूल कार्यक्रम का नाम था पिटारा और पिटारा में हर दिन अलग-अलग कार्यक्रम होते थे । तो शुक्रवार के पिटारे में बाइस्कोप की बातें होती थी। इस कार्यक्रम को किसी एक फिल्म पर केंद्रित किया जाता था। इस कार्यक्रम में उस फिल्म के बारे में, उसके संवाद, गीत और कलाकार के साथ-साथ टेक्नीकल मेंबर का भी परिचय दिया जाता था। इस एक घंटे के कार्यक्रम को जब सुनने वाला सुन कर उठता था तो ऐेसा लागता था कि वह फिल्म देख कर ही लौटा है। यही इस कार्यक्रम की खासियत थी । बिना किसी ताम झाम के कोई सुनने वाला कानों के माध्यम से फिल्म देख लेता था (अगर अभी भी वह कार्यक्रम प्रसारित होता हो तो था के बदले है पढ़ें)। अब कुछ लोगों के मन में सवाल उठ सकता है, कि क्या किताबों के लिये भी कोई ऐसा कम्बो पैक है जो सारे या चुने हुए विकल्पों से परिचय करा दे। यहाँ परिचय को परिचय के अर्थ में लें। यह ’घड़ी’ सर्फ-साबुन के विज्ञापन "पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें" वाले परिचय की हम बात नहीं कर रहे हैं। हम तो उस परिचय की बात कर रहे हैं जो पुराने जमाने मे वर-वधु को दूर से ही दिखा कर परिचय करवाया जाता था। और शादी के साल दो साल बाद गुण-अवगुण सामने आते थे ।

तो जनाब अब मैं यहाँ ये नहीं कहूँगा कि इस सवाल के उत्तर बहुत सारे विकल्प आयेंगे बल्कि मैं यहाँ यह कहूँगा कि उँगलियों पर गिनने लायक जो विकल्प आपके सामने आयेंगे उनमें नीरज गोस्वामी जी की ही "१०१ किताबें ग़ज़लों की..." सबसे पहले आयेगा। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें आपको १०१ विकल्पों से परिचय करवाया जायेगा। विकल्प भी ऐसे-ऐसे कि आप वाह कह उठेगें। और यह वाह साधारण वाह की तरह नहीं होगा। याद कीजिये फिल्म "नदिया के पार " का वह दृष्य जब चंदन और गुंजा की दूसरी मुलाकात होती है और गुंजा अपने बापू की हिदायत के मुताबिक चंदन का हाथ जोड़ कर स्वागत करती है और चंदन के मुँह से निकल पड़ता है "अरे वाह.."।  मैं जानता हूँ कि आपका वाह भी ठीक चंदन के वाह की तरह होगा ।

अब चलें कुछ बातें इस किताब के बारे में- साथ ही साथ जब आप अपने सुविधानुसार इस किताब में दिये किसी विकल्प के बारें मे पढ़ लेगें तो निश्चित तौर पर उसकी शाइरी के मे बारें में जान लेगें। इस किताब के माध्यम से राम सिनेही यायावर, कुँअर बैचेन, कुमार विनोद, राम कृष्ण पांडेय आमिल, आलम खुर्शीद, आर.पी घायल, गणेश बिहारी तर्ज, प्रियदर्शी ठाकुर ख्याल, सलीम खाँ फरीद आदि को पढ़ना सुखद है। वैसे इस किताब की दूसरी विशेषता है किताब में अतिरिक्त भूमिका का न होना। भूमिका किताब का परिचय देते समय अपने आप चली आती है। तीसरी जो सबसे बड़ी विशेषता है वह है, नीरज जी ने कहीं भी यह नहीं कहा है, कि यह आलचोना या समीक्षा है। इसके उलट उन्होंने कई जगह कहा कि यह आलोचना या समीक्षा नहीं है। आज के दौर में जब समाचार पत्रों की कृपा से दो लाइन की पुस्तक परिचय लिखने वाले भी अपने को आलोचक कहते हों उस समय "पुस्तक परिचय" को "पुस्तक परिचय" ही कहना साहस का काम है। और यह साहस कुछ वैसा ही है कि कोई तपस्वी तप भंग करने आयी अप्सरा की तरफ ध्यान ही न दें। साधुवाद इस साहस के लिये।  


अब कि जब आप इन विकल्पों को पढ़ चुके होगें, तो आपके मन में अचानक ही यह ख्याल आयेगा कि क्या मैं भी विकल्प बन सकता हूँ ? या कि मेरा लिखा भी विकल्प बन सकता है? और इसका उत्तर निश्चित रूप से हाँ होगा। और हो सकता है कि आप हाथ आजमाना भी शुरू कर दिये होंगे। मगर नये रसोइये की तरह कभी चावल कच्चा उतर जाता होगा तो कभी दाल में हल्दी अधिक हो जाती होगी । ऊपर में हमने बुखार की दवा की बात की है । मान लीजिये कि आप पेरासिटामोल बनाना चाहते है तो सबसे पहले आपको उसका सूत्र जानना पड़ेगा । बिना सूत्र जाने पता नहीं क्या बन जाये। मान लीजिये कि आपने जान ही लिया कि सूत्र C8H9NO2 है । तब आपका काम आसान हो सकता है क्योंकि आपको पता है कि C8 ही होगा H9 ही होगा और NO2 ही होगा। अगर आप NO3C8H9 या NO2C5H9 या NO2C8H1 करेगें तो वह कुछ और भले हो मगर पेरासिटामोल नहीं ही होगा इतना तय है। आप तो अपने आप पर मुग्ध होकर एक बार NO3C8H9 या NO2C5H9 या NO2C8H1 को ही पेरासिटमोल मान लें, मगर बुखारग्रस्त ( यहाँ पाठक ) का क्या होगा ? रिएक्शन तो होना तय ही समझिये। और इसी तरह आप गजल लिखने बैठ गये और रदीफ-काफिया- बहर के बारे में कुछ नहीं जानते तो सोचिये क्या होगा ? स्वाभाविक है, गलत गजल का पाठक पर रिएक्शन तो होगा ही। और जब रिएक्शन होगा तब सच्चे मन वाले शाइर जरूर जानना चाहेगें कि वह सूत्र क्या है या कहाँ से मिलेगा, जिससे सही गजल लिख सकूँ। तो फिर जबाब के रूप मे बहुत सारे विकल्प आयेगें । और उनमें वीनस केसरी जी की अरूजी विषयक किताब "ग़ज़ल की बाबत" भी सामने आयेगी।

फिर याद दिला दूँ कि मैं विकल्प की बात कर रहा हूँ। तीन खंडों मे बँटी यह किताब इस तरह है कि अगर आप पहले पन्ने से अंतिम पन्ने तक पहुँच गये तब फिर गजल से संबंधित सवालों का हल बिना किसी से पूछे आपके सामने होगा । कई बार देखा गया है कि अरूजी अच्छे शाइर नहीं होते इसी तरह अच्छे शाइर अरूजी नहीं होते मगर वीनस जी इसके अपवाद हैंं । इस किताब की वह बातें जो बाकी किताबों से इसे अलग करती है मैं उसे ही लिख रहा हूँ । मात्रा गिराने का जिस तरह से विस्तृत विवेचन वीनस जी ने किया है वह अन्य किताब में कम मिलता है । जिहाफ के स्थान का विवेचन तो इस किताब की सबसे पहली और सबसे बड़ी विशेषता हैं । मैने खुद कई अरूजी विषयक किताबें पढी हैं । उनमें जिहाफ का वर्णन तो रहता है मगर जिहाफ किस स्थान पर होगा और किस पर नहीं वह मुझे सिर्फ वीनस जी की किताब में ही मिला । और यही इस किताब को सबसे मजबूत विकल्प बनाती है। इस दो विषय के अतिरिक्त और विशेषाताएँ भी हैं । जैसे, काफिाया के शब्दों का विस्तारपूर्वक विवेचन, वाव-अत्फ का विवेचन, गजल दोष को काफिया, रदीफ और बहर के हिसाब से विवेचन, आदि । इस संक्षिप्त लेख में सभी विशेषाताओं का समावेश होना मुश्किल है । मगर जब आप वीनस केसरी जी की यह किताब पढ़ और समझ लेगें, तब गजल लिखना या कहना मुश्किल नहीं होगी ।

Views: 2339

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15
जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
Aug 10
Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Aug 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Aug 3
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service