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दूर-दूर तक ले जंगल के विस्तार रहे । जहाँ तक ले नजर परे हरियालिये हरियाली लउकत रहे । एकरे बीच में अपना हरिणी माई के गर्भ से ऊ सु्न्दर छौना जन्म लिहलस । जनम देते माई अपना पूरा ममता के छूअन भर के ओकरा के चाटे के शुरू कऽ दिहलस । माई के स्पर्श पा के छौना में धीरे-धीरे प्राण के संचार भइल । थोड़ही देर में ऊ पहिले हिले-डुले के शुरू कइलस । ओकरा बाद लड़खड़ात-लड़खड़ात खड़ा होखे के कोशिश करे लागल आ जब खड़ा होखे लागल तब दउरे के शुरुआत कर दिहलस ।

नरम हरिहर घास से भरल मैदान में जब छौना तनी सा दउरल तऽ ओकरा बड़ा मजा आइल । सोचलस कि तनी अउर दउरीं । तब अउर मजा आइल ओकरा । बस, फेर का रहे कुलांचा मार-मार के एने-ओने दउरे लागल । कवनो रोक-टोक ना रहे एहसे अउर मजा आवत रहे । छौना सोचलस कि संसार में बस ऊहे बा आ ओकरा सामने के घास के मैदान बा । एकरा अलावा कवनो बात के चिंता करे लायक ना ऊ रहे आ ना ओकरा एकर चिंता रहे ।

बाकिर ओकर माई के चिंता रहे । भले हरिहर घास के मैदान रहे । बाकिर ऊ एह बात से पूरा सजग रहे कि घास के मैदार जंगल के बीचे में रहे । जंगल - जहाँ तरह-तरह के हिंसक जानवर रहत रहले सन आ शिकार खातिर हमेशा घात लगवले रहत रहले सन । जहाँ जिंदगी हमेशा दाँव पर लागल रहत रहे आ जेकर दिन नीमन रहत रहे ऊहे बाँचत रहे। तुरन्ते जनमल छौना पर अबहीं तऽ ऊ दुलार बरसावल शुरुए गइले रहे । अबहीं तऽ ऊ मन भर के आपन दूधवो ना पिया पइले रहे तब ले छौना उछल-कूद कर के दौर-भाग करे में लाग गइल । शिकार के घात में लागल कवनो जानवर के नजर पर गइल तऽ एकर भागल मुश्किल हो जाई । अबहीं तऽ जिंदगी शुरुवे भइल बा । जिंदगी बचावे के दाँव-पेंच सीखे के तऽ अबहीं शुरुआतो नइखे भइल एकर । ऊ लगल छौना के बोलावे आ दउर-भाग करे से मना करे । पुचकार के अपना लगे बोलावे ।

छौना तनी सा ओकरा लगे आवे आ फेर छलांग मार के दूर भाग जाव । ओकरा खातिर ई एगो नया खेल शुरू हो गइल । जेतने ओकर माई ओकरा के लगे बोलावे ऊ ओतने दूर-दूर जाए के कोशिश करे लागल । बेर-बेर माई के लगे आवे आ ओकरा के छू के फेर दूर भाग जाव । अब धीरे-धीरे ऊ थाके लागल । बाकिर जोश में ओकरा कवनो कमी ना आइल ।

अंत में ऊहे भइल जेकर डर ओकरा माई के रहे । एगो सिंहनी अपना लइकन के लेके शिकार पर निकलल । दूरे से ऊ छौना के कुलांचा मारत आ दउरत देखलस । ओकर नजर छौना पर गड़ गइल । अपना परिवार के लेके शिकार के दाव लगवलस आ छौना के घेर लिहलस । घेरा गइला के बाद छौना के अपन माई के बात समझ में आइल । जब जान दाँव पर लागल रहेला तब ओह घरी इन्सान होखे भा जानवर, जान बँचावे खातिर कोशिश करे के हिम्मत अपने आप आ जाला । छौना तब ले दउर भाग कर के तनी थक गइल रहे बाकिर जब जान पर बनल तऽ जान बचावे के कोशिश में अउर जोर से भागे लागल । जोर से भागे के चक्कर में ऊ अउर जल्दी थाक गइल । धीरे-धीरे ओकर भागे के रफतार कम होत गइल आ अन्त में शिकारी के पकड़ में आ गइल ।

हिरणी माई बेचारी ! पहिले तऽ छौना के बचावे खातिर तनी कोशिश कइलस । बाकिर जब आपने जान फँसल होखे तब पहिले ओकरे के बचावे के कोशिश कइल जाला । ई तऽ एगो प्राकृतक नियम हऽ । तऽ माई हिरणी कुछ ना कर सकलस ।

एहीसे कहल जाला । बऽड़ के कहना मान ।

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Replies to This Discussion

SUNDAR ATI SUNDAR

DEEPAK
बहुते प्रेरक प्रसंग बा , नीलम बहिन रौवा त हिरन के बच्चा के सन्दर्भ बना के बहुत बरियार बात कह दिहनी, बहुत निमन लेख,
नीलम दीदी, बहुत ही विचारक और शिक्षाप्रद लेख,
Admin जी, गणेश जी, दीपक जी, रचना सराहे खातिर रउरा लोगिन के बहुत धन्यवाद ।
Bada badhiya. Prerak ba.

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