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अन्यायी के अब तू खोर खईहे 
अब ना केकरो से तू डेरईहे,
आपन हक़ खातिर डेग बढ़ईहे 
ना मिले त छीनभी लीहे,
मत लजईहे, मत सकुचईहे
सुनलिस नू ललमतिया ?
 
गाँव में नान्ह जात के कईसे लुटल घर
सब के उजडल-पुजडल टूटल-भंसल घर,
ब्लॉक से हाकिम के बोला के तू देखईहे
थानेदार के आगे तन के रपट लिखईहे,
मत लजईहे, मत सकुचईहे
सुनलिस नू ललमतिया ?
 
ओह दिन मुखिया के बेटा दारु पी के
कईसे लुटलख इज्जत तोहर बेटी के,
आपन गाँव में तू पंचाईत बोला के
आपन नान्ह जात लोग के जुटा के,
आपन बेटी के न्याय दियावे खातिर
हरेक गाँव से सब लोग के जुटईहे,
मत लजईहे, मत सकुचईहे
सुनलिस नू ललमतिया ?
 
बहुत हो गईल अब तोहनी के शोषण 
अब अउर मत होखे दे आपन दोहन,
अगर डेरईलीस, अगर लजईलीस त
हार जईबे तू आपन लडाई ललमतिया,
मत लजईहे, मत सकुचईहे
सुनलिस नू ललमतिया ?
 
 
--आर के पाण्डेय 'राज'
पटना/लखनऊ

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