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Rupam kumar -'मीत''s Blog (10)

मेरा दुख रोज़ बढ़ता जा रहा है(ग़ज़ल)

बह्र- 1222/1222/122

मेरा दुख रोज़ बढ़ता जा रहा है

दिल-ए-पुर-दर्द उमडा जा रहा है [1]

कोई लड़का क़रीब आया है तेरे

तभी दिल मेरा बैठा जा रहा है [2]

अब उसकी याद के दिए बुझा दो

हवा को ये बताया जा रहा है [3]

मेरी आँखों के रेशे फट रहे हैं

ये दरिया है कि बहता जा रहा है [4]

मैं सहरा में खड़ा हूँ और सर से

तेरी यादों का साया जा रहा है [5]

मैंने हाथों की नस काटी, तो…

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Added by Rupam kumar -'मीत' on August 12, 2020 at 9:00am — No Comments

सितारों के बिना ये आसमाँ अच्छा नहीं लगता

बह्र- 1222×4

ज़मीं भाती नहीं और आसमाँ अच्छा नहीं लगता

कहाँ ले जाएँ दिल को ये जहाँ अच्छा नहीं लगता[1]

मेरा दम शहर में घुटता है  कुछ दुख गाँव में भी हैं

यहाँ अच्छा नहीं लगता वहाँ अच्छा नहीं लगता [2]

वो अपने हाथ से जुगनू  नहीं ऊपर उड़ाता तो

सितारों के बिना ये आसमाँ अच्छा नहीं लगता [3]

हमारे घर में भी ख़ुशियाँ सभी मौजूद हैं लेकिन

हमें बरसात में अपना मकाँ अच्छा नहीं लगता [4]

नहीं हो हम-सफ़र जब साथ उस तन्हा…

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Added by Rupam kumar -'मीत' on August 5, 2020 at 1:00pm — 16 Comments

किनारों ने इसे बाँधा हुआ है(ग़ज़ल)

बह्र-1222/1222/122

समंदर आज तक ठहरा हुआ है

किनारों ने इसे बाँधा हुआ है[1]

जुदा आँचल से मत करना अभी तो

परिंदा छाँव में बैठा हुआ है[2]

मियाँ तक़दीर में बस मुफ़लिसों की

ज़मीन-ओ-आसमाँ लिक्खा हुआ है[3]

हमारे जिस्म की क़ीमत वही जो

हमारे इल्म में ख़र्चा हुआ है[4]

उसे तोहफे में देना आइना जो

ग़ुरूर-ए-हुस्न में डूबा हुआ है[5]

हमें लगता था तारे हम-क़दम हैं

निगाहों को बड़ा धोखा हुआ…

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Added by Rupam kumar -'मीत' on July 18, 2020 at 6:30am — 4 Comments

वो शह्र-ए-दिल सदा के लिए छोड़ क्या गया

बह्र-221/2121/1221/212

वो शह्र-ए-दिल सदा के लिए छोड़ क्या गया

आँखों से मेरी प्यार का मौसम चला गया[1]

उसको ख़बर थी ख़ौफ़ मुझे तीरगी से है

जलते हुए चराग़ तभी तो बुझा गया[2]

आँखों में था मलाल वो रुख़सत हुआ था जब

मुड़ मुड़ के दूर तक वो मुझे देखता गया[3]

आँखों में जिसकी 'मीत' में रहता था रात दिन

मुझको वो आज अपनी नज़र से गिरा गया[4]

रूपम कुमार 'मीत'

"मौलिक व…

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Added by Rupam kumar -'मीत' on July 10, 2020 at 10:00am — 12 Comments

रोज़ देता हूँ बद-दुआ तुमको

2122/1212/22 (112)

रोज़ देता हूँ बद-दुआ तुमको

ग़म-ज़दा ही रखे ख़ुदा तुमको[1]

जान-ए-जाँ मौसम-ए-ख़िज़ाँ में भी

हमने रक्खा हरा भरा तुमको[2]

बे-तरह चीख़ कर लिखा हमने

अपनी ग़ज़लों में बे-वफ़ा तुमको[3]

सुर्ख़ आँखें गवाही देती है

कल की शब भी थी रत-जगा तुमको[4]

हिज्र ने हमको बे-क़रार किया

मिल गया फ़ासलों से क्या तुमको[5]

बीच दरिया में हाथ छोड़ दिया

डूब जाऊँगा इल्म था तुमको[6]

अपनी मंज़िल…

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Added by Rupam kumar -'मीत' on June 27, 2020 at 11:00am — 7 Comments

ग़म-ज़दा होंट मुस्कुराते हैं

2122 1212 22

.

ग़म-ज़दा होंट मुस्कुराते हैं

तेरा जब नाम गुनगुनाते हैं[1]

नींद वो दर है जिसके खुलने से

ख़्वाब आँखों में जगमगाते हैैं[2]

अब उदासी में है परिंदे क्यूँ?

लोग पेड़ों से घर बनाते हैं[3]

तेरे गालों पे बिखरी वो ख़ुशबू

अपने होंटों से हम चुराते हैं

अब तो होता है अपना यूँ मिलना

अब्र सावन में जैसे आते हैंं[5]

तेरी सूरत पे लिक्खा…

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Added by Rupam kumar -'मीत' on June 7, 2020 at 10:30am — 21 Comments

ये ग़म ताज़ा नहीं करना है मुझको

१२२२/१२२२/१२२ 

ये ग़म ताज़ा नहीं करना है मुझको

वफ़ा का नाम अब डसता है मुझको[१]



मुझे वो बा-वफ़ा लगता नहीं है

मगर वो बे-वफ़ा कहता है मुझको[२]



मेरे पीछे जो तूने गुल खिलाए

तेरे चेहरे पे सब दिखता है मुझको[३]



नहीं है ग़मज़दा वो फिर भी उसने

भरम में आज तक रक्खा है मुझको[४]

मोहब्बत को उड़ाकर ख़ाक़ में वो,

सितमगर, बे-झिझक कहता है मुझको[५]

कलेजा चाक करके ख़ूँ किया है,

भला किश्तों में क्यूँ…

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Added by Rupam kumar -'मीत' on June 1, 2020 at 5:00pm — 4 Comments

मुँह ज़ख्मों के शे'र सुनाकर सीता है

मुँह ज़ख्मों के शे'र सुनाकर सीता है…
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Added by Rupam kumar -'मीत' on May 29, 2020 at 8:30am — 13 Comments

आज कल झूठ बोलता हूँ मैं

2122 1212 22

अपना ईमान खो रहा हूँ मैं

आज कल झूठ बोलता हूँ मैं

 …

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Added by Rupam kumar -'मीत' on May 28, 2020 at 12:30pm — 8 Comments

चराग़ों की यारी हवा से हुई है

122/122/122/122

चराग़ों की यारी हवा से हुई है

जहाँ तीरगी थी वहीं रौशनी है

इबादत में होना असर लाज़िमी है

वो नाज़ुक कली जो दुआ कर रही है

बिछावन मेरा क्यूँ सजाए गुलों से

मेरी आँख में नींद की अब कमी है

है सर्दी के मौसम में गर्मी का आलम

लिपट के वो मुझसे पिघलने लगी है

मैं आ तो गया हूँ फ़लक से वो लेकर

जो माँगी थी तुमने वही चाँदनी है

महब्बत के साये में बैठा हूँ थक कर

खुला आसमाँ है तुम्हारी कमी…

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Added by Rupam kumar -'मीत' on May 27, 2020 at 3:00pm — 5 Comments

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