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भीगी दुःखती ऑखे लेकर,
हम सपनों को पाने निकले,
मन के चिटके दप॔ण में,
गीला अक्स सजाने निकले।
जीवन शतरंज की गोटी, सिर्फ
हराए हरेक चाल पर,ऊपर बैठा
गजब खिलाड़ी ,हम भी
क्या दीवाने निकले ।
ऑख तौलती भार स्वप्न का,
होंठ हंसी की परिधि नापते,
सौदागर इस बस्ती में, क्या- क्या तो
कमाने निकले ।
महज उदासी पाई मन ने,
अपनेपन के रिश्तों में,
कुछ कदमों तक साथ चले थे,
बेहतर तो बेगाने निकले।


अन्विता ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Anvita on May 25, 2020 at 9:17am
महोदय, सादर अभिवादन ।प्रशंसा के लिए आभारी हूँ ।
Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on May 25, 2020 at 9:11am

हम भी क्या दीवाने निकले,वाह वाह बहुत ही धारदार रचना आदरणीया अन्विता जी दिल से बधाई आपको

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 21, 2020 at 1:34pm

आ. अन्विता जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on May 21, 2020 at 12:12pm

मुहतरमा अन्विता जी आदाब, अच्छी कविता लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

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