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गज़ल

221 2121 1221 212

उम्मीद अब नहीं कोई वो दीदावर मिले
बहतर खुुदा कसम वही चारागर मिले ( मतला )

लगता नहीं है दिल कोई तो हमसफर मिले
अब लौट आ कि हम सनम सारी उमर मिले

अनजान तुम नहीं हो कि मिलते नहीं कभी
कुछ कर सको तो तुम करो मुझको दर मिले

उलझन भरी हैं रातें बड़ी बेहिसी वो दिन
हो दोस्त कोई अपना सही रहगुज़र मिले

दिन- रात हो गये बड़े मुश्किल भी बढ़ गयीं
वापस चले तुम्हीं सनम आओ सहर मिले

आज़ाद हम ज़़रूर हुये खुश नहीं अभी
हो खुशनुमा डगर कि शामो-सहर मिले

लगता नहीं है दिल कोई तो हमसफर मिले
अब लौट आ सनम अभी सब कुछ महर मिले

दो फाड़ दर हुआ ही था अनजान हो गये
बदला मिजाज़ भाई का हम क़मनज़र मिले

चेतन नज़र बदल गई रिश्ते मुहाल हैं
ईमाँ -ज़़मीर गुम गए अ्पने न घर मिले

मौलिक एवम् अप्रकाशित
प्रोफ. चेतन प्रकाश 'चेतन'

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Comment by Chetan Prakash on August 10, 2022 at 4:22pm

कृपया मतले के सानी  मिसरे को  कुछ  यूँ  पढ़ें, " बहतर ख़ुदा क़सम  वही  तो चारागर  मिले", धन्यवाद  !

कृपया ध्यान दे...

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