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गिरगिट ( लघु कथा )


        चतुर चंद ने मोहल्ले के चबूतरे पर बैठकर प्रवचन देना आरंभ कर दिया था. वह गंभीरता का ढोंग धारण करते हुए बोले, “भक्त जनो! मानव के भीतर भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवों का वास है.”

बगल में बैठे फक्कड़ लाल ने चकित होकर पूछा, “अरे भाया मानव तो मानव ही होता है. फिर इसके भीतर भला जीव कैसे घुस गये.”

चतुर चंद पहले तो मंद-मंद मुस्कुराये फिर बोले, “हे फक्कड़ लाल! तुम्हारे असंतोष का निवारण करता हूँ. देखो जब मानव कुकर्म करता है, तो इसका कारण है, कि उसके भीतर से भेडिए नामक जीव के जीवाणु आकार लेना आरंभ कर देते हैं और इस प्रकार मानव भेडिये का रूप धारण कर लेता है. जब उसके भीतर बहादुरी के जीवाणु उत्पन्न होते हैं, तो वह शेर बन जाता है और जब वह धूर्तताभरी चालाकी अपनाता है, तो वह...”

अपनी बात अधूरी छोडकर वह भागे-भागे गये और सामने से आ रहे दुखीराम के चरणों में जाकर लोट गये.

एक से फक्कड़ लाल ने पूछा, “भइया दुखीराम और चतुर चंद में तो छत्तीस का आँकड़ा है. फिर यह चतुर चंद दुखीराम के पैर क्यों पकड़ रहा है?”

उसने बताया “चतुर चंद के बेटे का दाखिला जिस कॉलेज में हुआ है, दुखीराम उसका प्रिंसिपल है.”

फिर अचानक फक्कड़ लाल मुस्कराते हुए बोले, “भक्त जनो! गौर से देखिए. चतुर चंद के भीतर जीवाणु उत्पन्न होकर एक जीव का रूप धारण करते जा रहे हैं. कोई बताएगा कि चतुर चंद ने किस जीव का आकर ग्रहण कर लिया है?” वहाँ उपस्थित जनसमूह एक स्वर में बोला, “गिरगिट.”

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Comment by Ashok Kumar Raktale on August 14, 2012 at 8:12am

सुन्दर लघुकथा.  सभी को आत्मविश्लेषण कि जरूरत है. बधाई.

Comment by Rekha Joshi on August 10, 2012 at 11:00am

आज कल इस दुनिया में चतुर चंदके जीवाणु फैल रहें है ,इंसान के रूप में गिरगिट जैसे अनेकों जीव आपके आस पास मंडरा रहें है ,अच्छी प्रस्तुति पर बधाई   

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