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जा रहे हम दूर-दूर

ढलते पहर में लम्बाती परछाईयाँ

स्नेह की धूप-तपी राहों से लौट आती

मिलन के आँसुओं से मुखरित

बेचैन असामान्य स्मृतियाँ

ढलता सूरज भी तब

रुक जाता है पल भर

बींध-बींध जाती है ऐसे में सीने में

तुम्हारी  दुख-भरी भर्राई आवाज़

कहती थी ...

"इस अंतिम उदास

असाध्य संध्या को

तुम स्वीकारो, मेरे प्यार"

पर मुझसे यह हो न सका

अधटूटे ग़मगीन सपने से जगा

मैं पुरानी सूनी पटरी पर खड़ा

घबराया

कर रहा हूँ तब से बेमाप अकेले में

कभी न आने वाली

पहचानी ट्रेन का इन्तज़ार

         --------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on June 4, 2019 at 1:16am

आपने रचना को मान दिया, आपका हार्दिक आभार, आदरणीय नरेन्द्रसिहं जी।

Comment by vijay nikore on June 4, 2019 at 1:14am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय गिरिराज जी।

Comment by narendrasinh chauhan on June 1, 2019 at 6:12pm

बहुत खूब  विजय जी , कविता के लिए हार्दिक बधाईयाँ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 1, 2019 at 12:50pm

बहुत खूब  आदरनीय बड़े भाई विजय जी , कविता के लिए आपको हार्दिक बधाईयाँ |

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