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सूर्यास्त के बाद

निर्जन समुद्र तट

रहस्यमय सागर सपाट अपार

उछल-उछलकर मानो कोई भेद खोलती

बार-बार टूट-टूट पड़ती लहरें ...

प्यार के कितने किनारे तोड़ 

तुम भी तो ऐसे ही स्नेह-सागर में

मुझमें छलक-छलक जाना चाहती थी

कोमल सपने से जगकर आता

हाय, प्यार का वह अजीब अनुभव !

डूबते सूरज की आख़री लकीर

विद्रोही-सी, निर्दोष समय को बहकाती

लिए अपनी उदास कहानी

स्वयँ डूब जा रही है ...

आँसू भरी हँसी लिए ओठों पर

जैसे तुम मुझको हँसाती-बहकाती

अन्तस्थ में थामे कोई मूक संवेदन

हर विदाई में सिर मेरी गोदी में रख

घबराकर खुद रो-रो देती थी

अब स्वप्नातीत महाशून्य

थल से सागर से सागर तक

गहराता अकेलापन

अकल्पित सन्नाटा

अन्धकार-अम्बर में अब

अँधेरा रौशनी से ज़्यादा पुराना

ज़्यादा पहचाना लगता है

अनिश्चित साँसों के पीले सूर्यास्त में

भटका करती स्मृतियों के दरवाज़े खोल-खोल

मेरे हाथों में उष्मा भरते तुम्हारे स्नेहिल हाथ

अनजाने, मैं संकुचित और भयभीत

बहुत भारी हो रहा है अब

उमढ़ते प्यार का वह

हृदयभेदी "अजीब" अनुभव

                   -------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on June 23, 2019 at 4:14pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई समर कबीर जी। आपके स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना है।

Comment by vijay nikore on June 23, 2019 at 4:12pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुशील जी।

Comment by Samar kabeer on June 22, 2019 at 6:40pm

जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत उम्द:,गम्भीर,भावपूर्ण रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on June 22, 2019 at 4:37pm

वाह आदरणीय निकोर जी अंतर्मन के भावों को आप जिस तरह शब्दों में बाँध प्रवाह देते हैं ,उसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती। इस भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए दिल से बधाई सर।

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