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Vijay nikore's Blog (139)

प्रिय भाई डा० रामदरश मिश्र जी

आज १५ अगस्त... कई दिनों से प्रतीक्षा रही इस दिन की ... डा० रामदरश मिश्र जी का जन्म दिवस जो है । आज उनसे बात हुई तो उनकी आवाज़ में वही मिठास जो गत ५६ वर्ष से कानों में गूँजता रहा है। उनका सदैव स्नेह से पूछना , “भारत कब आ रहे हैं ? ” ... सच, यह मुझको भारत आने के लिए और उतावला कर देता है  .. और मन में यह भी आता है कि आऊँगा तो प्रिय सरस्वती भाभी जी के हाथ का बना आम का अचार भी खाऊँगा ... बहुत ही अच्छा अचार बनाती हैं वह ।

कैसे कह दूँ उनके स्नेह से मुझको स्नेह नहीं है, जब उनकी मीठी…

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Added by vijay nikore on August 16, 2018 at 8:00am — No Comments

खुदापरस्ती

खुदापरस्ती   ... (अतुकांत)

मुअम्मे कुछ ऐसे जो हम जीते रहे

पर ज़िन्दगी भर हमसे बयां न हुए

 

कैसी है तिलिस्मी मुसर्रत की तलाश

मशगूल रखती रही है शब-ओ-रोज़

हसरतें भी देती हैं छलावा…

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Added by vijay nikore on August 13, 2018 at 9:08pm — 8 Comments

छ्टपटाह्ट

छटपटाहट

समझ नहीं पाता हूँ 

उदासी से भरी गुमसुम निस्तब्धता

अनदीखे  अन्धेरे  में  वेदना  का 

चारों ओर सूक्षम समतल प्रवाह

पास हो तुम, पर पास होकर भी

इतनी  अलग-सी, व …

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Added by vijay nikore on August 5, 2018 at 8:00pm — 15 Comments

घाव समय के

अस्तित्व की शाखाओं पर बैठे

अनगिन घाव

जो वास्तव में भरे नहीं

समय को बहकाते रहे

पपड़ी के पीछे थे हरे

आए-गए रिसते रहे 



कोई बात, कोई गीत, कोई मीत

या…

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Added by vijay nikore on July 14, 2018 at 5:36pm — 22 Comments

काल कोठरी

काल कोठरी

निस्तब्धता

अँधेरे का फैलाव

दिशा से दिशा तक काला आकाश

रात भी है मानो ठोस अँधेरे की

एक बहुत बड़ी कोठरी

सोचता हूँ तुम भी कहीं …

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Added by vijay nikore on June 24, 2018 at 1:22am — 37 Comments

परदेशी-बाबू

थाहों में टटोलती कुछ, कहती थी 

जाकर वहाँ फूलों की सुगन्ध में

नकली-कागज़ी मुस्कानों की उमंग में

क्या याद भी करोगे मुझको

बताओ  न 

स्मरण में सहज दोड़ती आऊँगी क्या ?

या, जाते ही वहाँ बन जाओगे वहाँ के

पराय-से अजीब अस्पष्ट परदेशी-बाबू तुम

नई मुख-आकृतियों के बीच देखोगे भी क्या

मुढ़कर, मद्धम हो रही इस पुरानी पहचान को

या सरका दोगे इसे स्मृतिपटल से

तुम मात्र मिथ्या कहला कर इसे

माना कि टूटा है हमारा वह…

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Added by vijay nikore on June 18, 2018 at 9:00pm — 8 Comments

ताहिर तामीर

रोशनी का कोई  सुराख़ न सही

बेरुखी ही प्यार का अंदाज़ सही

कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं

यह माना कि जिगर में तुम्हारे

कोई तीखी  ख़राश है आज

तल्खी  है, कसक  है  बहुत

है  कशमकश  भी  बेशुमार

इस  पर  भी  परीशां  न  हो

खालीपन  को  तुम

बहरहाल  खाली  न  समझो

आएँगे लम्हें जब कलम से तुम्हारी                        

अश्कों  के  मोती  गिर-गिर  कर

किसी गज़ल के अश’आर बनेंगे

तब  तरन्नुम  से  पढ़ना  उनको

लाज़िमी है…

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Added by vijay nikore on June 12, 2018 at 1:30am — 20 Comments

अकुलायी थाहें

अकुलायी थाहें

कटी-पिटी काली-स्याह आधी रात

पिघल रहा है मोमबती से मोम

काँपती लौ-सा अकुलाता

कमरे में कैद प्रकाश

आँखों में चिन्ता की छाया

ऐसे में समाए हैं मुझमें

हमारे कितने सूर्योदय

कितने ही सूर्यास्त

और उनमें मेरे प्रति

आत्मीयता की उष्मा में

आँसुओं से डबडबाई तेरी आँखें

तैर-तैर आती है रुँधे हुए विवरों में

तेरी-मेरी-अपनी वह आख़री शाम

पास होते हुए भी मुख पर…

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Added by vijay nikore on June 10, 2018 at 12:13pm — 19 Comments

मरज़ जुदाई का (अतुकांत)

जुदाई है महरुमी-ए-मरज़ क्या, जुदाई कहे क्या

हो ज़िन्दगी में खुशी का मौसम या मातम इन्तिहा

कर देती है दिल को बेहाल हर हाल में यह

रातें मेरी हैं बार-ए-गुनाह अब जुदाई में तेरी

किस्सा: है  कुश्त-ए-ग़म, यह तसव्वुर है कैसा

कहीं आकर पास  दबे पाँव न लौट जाओ तुम

नींद तो क्या यह रातें अंगड़ाई तक हैं लेती नहीं

अंजाम के दिन बुला कर आख़िर में पूछेगा जो

आलम अफ़्रोज़ खुदा उसूलन पास बुला कर मुझे

यूँ मायूस हो क्यूँ? मलाल है? आरिज़: है…

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Added by vijay nikore on May 28, 2018 at 1:30pm — 10 Comments

विरह रो रहा है... मिलन गा रहा है

मधुर अप्राकृत  प्यार ...

करी थी जिसकी इन्तज़ार

ज़िन्दगी भर  ... ज़ार-ज़ार

आया है स्वयं अब वसन्त बन

निकटतम आस-पास, इतना पास

 

ज़िन्दगी के इस पढ़ाव पर

तुम आई रवि-रश्मि बन प्रिय

तुम्हारे अप्रतिम स्नेह में मानो

मैं हूँ विराजा राज-सिहाँसन पर

परी-सी आई हो किस निद्रा के द्वार

 

झूम रहे स्नेह के हल्के-हल्के उदगार                     

उपवन में गा रहे कोयल, फूल, और धूप

हर्षित है संग उनके  यह खुला…

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Added by vijay nikore on May 16, 2018 at 11:00pm — 4 Comments

गुलज़ार प्यार का

गुलज़ार प्यार का

हर रात  उसी ग़मरात का  ज़िक्र  न  कर

नातुवां  ग़म को अपने  तू  गैरअहम  कर

ज़िन्दगी  में  माना गर्द-ए-सफ़र  है  बहुत

ग़म-ए-पिनहाँ का रोज़ रंज-ओ-ग़म न कर

यूँ खामोश न रह,  उदास और न हो

वादा यह पक्का कि लौट आऊँगा मैं

दिन में  सही या रातों में तुम्हारी.. या

आ कर मुस्कराऊँगा ख़्वाबों में कभी

गालों पर मेरे…

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Added by vijay nikore on May 7, 2018 at 5:39am — 8 Comments

एक उखड़ा-दुखता रास्ता

एक उखड़ा-दुखता रास्ता

(अतुकांत)

कभी बढ़ती, कम न होती दूरी का दुख शामिल

कभी कम होती नज़दीकी का नामंज़ूर आभास

निस्तब्ध हूँ, फड़क रही हैं नाड़ियाँ

देखता हूँ तकलीफ़ भरा बेचैन रास्ता ...

खाली सूनी नज़र से देख रहा है जो कब से

मेरा आना ... मेरा जाना

घूमते-रुकते हताश लौट जाना

कुछ ही देर में फिर चले आना यहाँ

ढूँढने…

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Added by vijay nikore on May 6, 2018 at 11:43am — 14 Comments

पिघलती हुई मोम

पिघलती हुई मोम

(अतुकांत)

हम दोनों .... दो छायाएँ

अन्धकारमय एकान्त में

फूटे हुए बुलबुलों-सी

सुन्न हो रही भावनाएँ

कितनी नदियों का संगम…

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Added by vijay nikore on May 5, 2018 at 6:00am — 10 Comments

मुंतज़िर मुंतज़िर रहा

मुंतज़िर मुंतज़िर रहा 

मूरत बनाई थी जो

मुस्सवर ख़्यालों में

अब तक वह पाक

हसीन खवाब ही रही

रातों अँधेरे में कभी

दिन के उजाले में भी

रोज़ आई मुस्तकिल:

हलकी-सी मुस्कराई

बिना सलाम चली गई

मैं डरता रहा थर-थर

तस्वीर की तकदीर…

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Added by vijay nikore on April 19, 2018 at 11:47am — 26 Comments

एकाकीपन

एकाकीपन

भटकती भीड़ है बाहर

भीतर  पसर  रहा

कपूर-सा उड़ता

आँसू-विहीन

अटूट अकेलापन

सांकल लगे बंद कमरे का

निर्जीव सुन्न…

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Added by vijay nikore on April 19, 2018 at 11:30am — 12 Comments

तब्दीले आबोहवा

तब्दीले आबोहवा

न सवाल बदला, न जवाब बदला....

न  मंज़र  न  मक़ाम  बदला

कागज़ के उड़ते चिन्दे-सा हूँ मैं

उड़ा दिया हवा ने जब-कभी

उड़ा जिधर रुख हवा ने बदला

चाह कर भी न बदल सका

न खुद को न खुदाई को मैं

हाँ, कई बार क़िर्वात  का

आदतन क़ुत्बनुमा बदला

गुज़रा जब भी तुम्हारी गली से

बेरहम बेरुखी के बावजूद भी

साँकल खटखटाई हरबार

न  आई चाहे  तुम दरवाज़े …

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Added by vijay nikore on April 19, 2018 at 11:30am — 18 Comments

दुआ कर ग़म-ए-दिल, दुआ कर तू

दुआ कर ग़म-ए-दिल, दुआ कर तू

नफ़रत को नफ़रत से न देख तू,  रात भर बेकरार न हो

रुसवा  है  वह,  पर  रह्म  दिल  है  तू,  रऊफ़  है  तू 

कर दुआ  कि सोच पर उसकी,  रहमत खुदा की हो

रफ़ीक ने दी है  चोट तुम्हें, उसका  उसे  मलाल  हो…

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Added by vijay nikore on April 17, 2018 at 3:51pm — 6 Comments

जज़्बात

जज़्बात

(अतुकांत)

हर फ़ल्सफ़:  यूँ बयाँ न ही हो तो अच्छा

शबे-वस्ल  हमेशा  मीठी  तो  नहीं होती

रात-अँधेरे जब नींद ओझल हो आँखो से

चले आते हैं मेरे ही फ़ल्सफ़े डसने मुझको

मेरा कहा आज कलामे मुस्तदाम न सही

या अल्फ़ाज़ मेरे चरागे आस्मानी न सही

जानता हूँ सोचेगा कर्दगार खुदा ही कभी

क़लमदस्त का कलाम ऐसा बुरा तो न था

रहमत होगी तब खुदा की, बुलाएगा मुझ्रे

रिहाइश के वास्ते…

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Added by vijay nikore on April 9, 2018 at 3:51pm — 14 Comments

आलमे खयाल

आलमे खयाल

(अतुकांत)

शाम बैठी रही हो कर तैयार वह दुलहन-सी

उदास.. मुन्तज़िर थी वह आज भी इश्क की

ज़रूर निराला ही होगा  यह आलमे तसव्वुर

दर पर हाँ एक हल्की-सी दस्तक तो हुई थी…

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Added by vijay nikore on April 8, 2018 at 7:59am — 11 Comments

माथे की बिन्दी

माथे की बिन्दी

कोई ताज़ी भूलें, कुछ नए आँसू

हमारा अब अलसाया-सा बन्धन

ले आता है ओठों पर रूक-रूक एक ही सवाल ---

सुबह से गोधूली तक के अल्प समय में 

तिरछी परछाइयाँ डूबने से पहले ही

मेरे प्यार, भूल गए तुम प्यार की पहचान

तुम कैसे इतने बदल गए ?

समुद्र से करती कोमल-स्पर्श संवेदित हवाएँ

लहरों के ओठ बन्द कर उन्हें सुलातीं थीं जो

उन हवाओं के भी जैसे  मिजाज बदल…

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Added by vijay nikore on April 2, 2018 at 11:00am — 10 Comments

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