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ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द

ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द

चढ़ाये मैंने जो कुछ स्वर

बस केवल अंजुरी भर

पूरे युग के चौराहे पर

कुछ कानों को क्यों नागवार गुजरे

ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द


वैसे सच है ये भी कि

उम्मीद ही नहीं थी इस बार

कि खाली जाएंगे सब वार

कि किसी को चुभेंगे ही नहीं

ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द


ये भी नहीं कहना चाहते मेरे शब्द

कि अब जो कुछ भी हैं

बस आप ही की कृपा है मेहरबानी है

कि ये आप ही की चिट्ठी थी

कि अपनी तो महज़ जुबानी है

कि आपकी है बारी तो क्यों परेशानी है

ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द

कि अपने कानों का ही जीना मुहाल है

हर ध्वनि पिघले शीशे की मिसाल है

अब कहाँ जायेँ कैसे करें हिम इसे

लावे की लावे से अजब मुलाक़ात है

ये भी नहीं कहना चाहते मेरे शब्द

कि ज़रूर ही सच होगा ये

पर ये कान की गवाही है

कि सच ने सुनाई है

कि ये बाज़ार युग है

निरंतर सा युद्ध है

तो जो ये बाज़ार है

लिया-दिया आधार है

तो क्यों कहते हो हर बार

बार-बार, सरे बाज़ार

कि चढ़ाये मैंने जो कुछ स्वर

वो कानो को नागवार गुजरे
.
... “मौलिक व अप्रकाशित”

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 17, 2020 at 11:09am

आ. अमिता जी, सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on February 12, 2020 at 7:50am

मुहतरमा अमिता तिवारी जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें।

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