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प्रणय-परीक्षा

प्रणय-परीक्षा

सुना है कुछ ऐसा केवल

स्वप्न-लोक में 

या परियों की कहानी में होता है

सात समुद्र पार से आता है

घोड़े पर सवार

सात युगों का प्यार

पर हवा-सी झूमती

शैतानी-भरी हँसी हँसती

भरे आँखों में खुमारी की लालिमा

ऐसी गुड़िया से मिलना

मेरे जीवन के रंग-मंच पर

यह कोई सपना नहीं था

काट रही थी कब से मुझको

समय की तेज़ धार

मिला हवा की लहर-सा तुम्हारा हलका स्पर्ष

आ गए जीवन में नित-नित नए स्वर

मिली तुम, आ गई हो जैसे बेमौसम

नए वसन्त की पहली फुहार

ऐसे में... मैं तुम्हारे संग ...

मुझको लगा कि मैं

प्यार की पहली

प्रारम्भिक कक्षा में था, और

सहज कैसे किसी पाठ्य-पुस्तक के बिना

पढ़ना, प्यार करना, हँसना

सब तुमने मुझको सिखा दिया

मेरी प्रिय, मेरी आदि मेरी अंत

पढ़ा दिया जो मुझको तुमने यह ग्रन्थ

अब जब चाहे तुम आज़माइश कर लो

ले लो कभी भी इम्तहान मेरी धड़कन का

थिरकती है जो केवल तुम्हारे लिए

तुम्हारे संग, तुम्हारे आँचल के तले

                 -------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by vijay nikore on March 28, 2020 at 4:03pm

आपसे मिली सराहना अमूल्य है। हार्दिक आभार, भाई समर कबीर जी।

Comment by Samar kabeer on March 24, 2020 at 7:30pm

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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