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कोरोना और सावन

सखी री, जे कोरोना लै गयौ,
सावन की बहार।
ना उमंग के बादल घुमड़ें,
ना उत्साह की फुहार।।

अब के सावन ऐसे लागै,
बिन शक्कर की चाय।
ना बागों में झूले पड़ रहे,
ना सेल कौ परचम लहराऐ।।

तीज त्यौहार अबके सावन के,
सब फीके फीके लागैं।
सखी री, अब तोसे मिलने कूं,
जियौ मेरौ तरसो जावै।।

भाई बहन राखी त्यौहार अब,
पहले जैसौ कैसे मनावें?
हरियाली तीज पर सखियां अब,
गीत मल्हार भी कैसे गावें?

अपने कान्हा के दर्शन कूं,
मेरौ जियो बहुत मचलावै।
सखी री,अब के जैसौ सावन,
ना दोबारा कबहुं आवै।।

.

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 9, 2020 at 11:27pm

प्रिय नीता 
ये मंच साहित्य का गुरुकुल है, ऐसा अप्रतिम गुरुकुल जहाँ सब एक दूसरे को पढ़ते हुए , सीखते हैं , और ब्लॉग पोस्ट्स, आयोजनों आदि में रचनाओं पर होती चर्चा परिचर्चा से परस्पर सीखते हुए लेखनी को परिष्कृत करते चलते हैं.. 

उम्मीद है और विश्वास भी कि तुम्हारे लिए ये सफ़र बहुत सार्थक होगा 

शुभातिशुभ 

Comment by Neeta Tayal on July 9, 2020 at 10:47pm

बहुत बहुत आभार सखी, तुम्हारे गाइडेंस में मुझे बहुत सीखना है


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 9, 2020 at 7:57pm

प्रिय सखी नीता 

तुम्हारा मंच पर तुम्हारी पहली रचना के साथ बहुत बहुत स्वागत है 

आंचलिक शैली में ये सामयिक कविता मन भावों की यथार्थ अभिव्यक्ति है... बहुत सुन्दर रचना हुई है..
माँ सरस्वती तुम पर अपना आशीष हमेशा बनाएं 

शुभकामनाएं 






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