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अहसास की ग़ज़ल :मनोज अहसास

2×15

एक ताज़ा ग़ज़ल

लाखों ग़म की एक दवा है, सोचो ! कुछ भी याद नहीं.
कोई शिकायत करने आए,कह दो कुछ भी याद नहीं.

हमने उसकी यादें जीकर उसकी याद के गीत लिखे,
उसने पढ़कर लिख भेजा है, उसको कुछ भी याद नहीं.

मेरी कहीं इक बात पे मेरा साथी रूठ गया मुझसे,
मैंने वफ़ा की याद दिलाई,वो तो कुछ भी याद नहीं!

मेरी तड़प तो भूलना बेहतर था तेरे जीने के लिए,
तुमने काटी थीं जो रातें रो-रो,कुछ भी याद नहीं?

सारे कागज़ के टुकड़े तो आग निगलकर खाक हुए,
मेरे क़ासिद तुम भी जोर से बोलो, कुछ भी याद नहीं.

वक्त गुज़र जाने पर दुनिया में अल्फाज़ बदलते हैं,
सारी बीती बातें छोड़ो, पकड़ो कुछ भी याद नहीं.

"अहसास" ज़माने भर के अंदर छुपे हुए हैं राज कई,
तुम भी अपनी जान बचाओ लिक्खो कुछ भी याद नहीं.

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on August 6, 2020 at 9:04pm

आदरणीय मुसाफ़िर जी हार्दिक आभार

सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 6, 2020 at 5:02pm

आ. भाई मनोज जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

मेरी कहीं इक बात पे मेरा में "कहीं " को "कही " कर लें ।

कृपया ध्यान दे...

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