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उसका हर गीत ही अखबार हुआ जाता है,
क्यों ये फनकार पत्रकार हुआ जाता है !

जबसे आशार का मौजू बना लिया सच को,
बेवजन शेअर भी शाहकार हुआ जाता है !

अपने बच्चों को जो बाँट के खाते देखा ,
दौर ग़ुरबत का भी त्यौहार हुआ जाता है !

बेल बेख़ौफ़ हो गले से क्या लगी उसके
बूढा पीपल तो शर्मसार हुआ जाता है !

हरेक दीवार फासलों की गिरा दी जब से
सारा संसार भी परिवार हुआ जाता है !

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Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on July 25, 2010 at 10:41am
अपने बच्चों को जो बाँट के खाते देखा ,
दौर ग़ुरबत का भी त्यौहार हुआ जाता है !

बहुत ही बढ़िया रचना है योगी भैया...आपकी कलम की ताक़त का कोई जवाब नही है कोई तोड़ नही है....बहुत खूब भैया बहुत खूब....

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 24, 2010 at 9:10pm
योगराज भैया कमाल की ग़ज़ल लिखी है, जबरदस्त शे'र कही है आपने, तीसरा शे'र और मकता काफ़ी उम्द्दा लगा, आप का जबाब नहीं है योगराज भैया ,जबरदस्त लिखते है, बहुत खूब, बधाई स्वीकार करे ,जय हो,
Comment by विवेक मिश्र on July 24, 2010 at 9:05pm
prabhakar sir ke kya kehne... jo likh dete hain, aap hi behtareen ho jaati hai.. ek-2 sher apne mein gehraai samete hue hai.. bahut hi badhiya..
Comment by asha pandey ojha on July 18, 2010 at 2:14pm
waah bhaisaab is gzal ko jitnee baar padho utnee baar nai w taza lagtee hai .. bahut hee umda hai .. जबसे आशार का मौजू बना लिया सच को,
बेवजन शेअर भी शाहकार हुआ जाता है !

अपने बच्चों को जो बाँट के खाते देखा ,
दौर ग़ुरबत का भी त्यौहार हुआ जाता है !seedhee dhmniyon me utr gain ye panktiyan lahoo kee tarh waah anand aaya
Comment by baban pandey on July 16, 2010 at 9:06pm
हरेक दीवार फासलों की गिरा दी जब से
सारा संसार भी परिवार हुआ जाता है !
अब मैं भी ग़ज़ल सिखाने की कोसिस में हू भाई .उर्दू का स्टोक बहुत ही कम है मेरे पास

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