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दिल का दादी होना

दिल का दादी होना 

 तब कोई हैरानी भी नहीं होती थी
जब कागा मुंडेर पर कगराता था
और सांझ तक कोई अतिथि आ भी जाता था

तब कोई हैरानी भी नहीं होती थी
जब माँ की बाँई आँख फड़फड़ाती थी
और साँझ तक कोई अच्छी खबर आ भी जाती थी

पर जान तब सूख जाती थी
जब नदी दादू को सुर बदल कर शोर सुनाती
और अगले सूरज के चढ़ते
 नदी में कोई छलांग डूब जाती थी

दादू का कहना होता था
कि नदी बलि मांगती है

परन्तु पति- परायण दादी की सहमति
मैंने कभी नहीं देखी थी इस विचार पर
वो हमेशा कहती कौन नहीं चाहता जीना
पर ज़िन्दगी तो हो

दादी का मानना था कि नदिया और धरती में
पक्का कोई बहनापा है
जब जब धरा अपना हृदय नहीं चीर पाती है
सीता को सीने में नहीं छिपा पाती है
तो बतियाती है नदिया संग बेबसी
सुनाती है उसे ताज़ा घटित सीता- पुराण
सुनती है नदिया और गुस्साती है
बिल्कुल बदल जाता है उसका सुर 
जिसे सुन तो लेते है जानकार ज्ञानी लोग 
बड़े बूढ़े समझ भी लेते हैं
पर कारण तक नहीं पहुँच पाते या पहुँचना नहीं चाहते कभी 
और कह देते हैं 
कि नदी बलि मांग रही है 

पर समझ जाती है दादी
अहिल्या के पथराने की मर्मान्तक पीड़ा
और मानती है पूरी दृढ़ता से
कि जब धरा होती है बेबस
तब नदिया बहनापा निभाती है
और ब्याकुल बेबस हो चुकी
बहिन बेटी भाभी को गोद में बुलाती है

खेद आज भी है तब भी था खेद
कि दादू की नदिया-सुर-पहचान-क्षमता
केवल धुन परिवर्तन समझ तक जा कर क्यों रुक जाती है
क्यों सुन नहीं पाती है
उस परिवर्तन के पलीते की सुरसुराहट
क्यों उस जलन को महसूसने के लिए
दिल का दादी होना ज़रूरी होता है हर युग में ?
............

अमिता तिवारी 
नौलिक व  अप्रकाशित 

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