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प्रेम की मैं परिभाषा क्या दूँ... दिनेश कुमार ( गीत )

प्रेम की मैं परिभाषा क्या दूँ... दिनेश कुमार

( सुधार और इस्लाह की गुज़ारिश के साथ, सुधिजनों के समक्ष, गीत विधा पर पहली कोशिश... )

प्रेम की मैं परिभाषा क्या दूँ...

मौन अधर हैं दिल में कम्पन
महक रहा हर सू बस चन्दन
पतझड़ का मौसम भी सावन
फूल खिले हैं गुलशन गुलशन

मन के भाव सुकोमल पंछी
इनको एक घरौंदा क्या दूँ

प्रेम की मैं परिभाषा क्या दूँ....

मोहन की हर सांस में राधा
जहाँ राम हैं वहीं है सीता
मरी नहीं है क़ैस की लैला
पृथ्वीराज की लाज संयुक्ता

दो जिस्मों में रूह एक है
द्वैत भाव को जड़ता क्या दूँ

प्रेम की मैं परिभाषा क्या दूँ.....

प्रेम तपस्या, प्रेम इबादत
अपना जीवन, उसकी अमानत
मन मंदिर में एक ही मूरत
उसका सज्दा, अपनी इशरत

जन्म जन्म के बंधन को मैं

रिश्तों का इक जामा क्या दूँ

प्रेम की मैं परिभाषा क्या दूँ.....

दिल के भेद मिटाना चाहूँ
उसके दुख अपनाना चाहूँ
बिन क़ीमत बिक जाना चाहूँ
अम्बर तोड़ के लाना चाहूँ

जो मेरा है, सब उसका है
फिर उसको मैं तोहफ़ा क्या दूँ

प्रेम की मैं परिभाषा क्या दूँ.....

दिनेश कुमार।

मौलिक व अप्रकाशित

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