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ग़ज़ल -- दिनेश कुमार ( दस्तार ही जो सर पे सलामत नहीं रही )

221--2121--1221--212

दस्तार ही जो सर पे सलामत नहीं रही

जी कर भी क्या करोगे जो इज़्ज़त नहीं रही

झूठों की सल्तनत में हुआ सच का सर क़लम 

ऐसा भी सब में कहने की हिम्मत नहीं रही

जो फ़ाइलों में पुल था बना, कब का ढह गया

सरकारी काम काज में बरक़त नहीं रही

संसार लेन देन का बाज़ार बन गया

रिश्तों में अब लगाव की क़ीमत नहीं रही

देखो तो काम एक भी हमने कहाँ किया

पूछो तो एक पल की भी फ़ुर्सत नहीं रही

दर पर ख़ुदा के सिर्फ़ सवाली ही रह गए 

कहने को सर झुके हैं, अक़ीदत नहीं रही

ऐसा नहीं कि दूर हैं मुझसे ख़ुशी के पल

बस मुझको मुस्कुराने की आदत नहीं रही 

दिनेश कुमार

( मौलिक और अप्रकाशित )

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