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दोहा सप्तक. . . . . रिश्ते

तार- तार रिश्ते हुए, मैला हुआ अबीर ।
प्रेम शब्द को ढूँढता, दर -दर एक फकीर ।1।

सपने टूटें आस के , खंडित हो विश्वास ।
मुरझाते रिश्ते वहाँ, जहाँ स्वार्थ का वास ।2।

देख रहा संसार में, अकस्मात अवसान ।
फिर भी बन्दा जोड़ता, विपुल व्यर्थ सामान ।3।

ऐसे टूटें आजकल, रिश्ते जैसे काँच ।
पहले जैसे प्रेम की, नहीं रही अब आँच ।4।

रिश्तों के माधुर्य में, झूठी हुई मिठास ।
मन से तो सब दूर हैं , तन से चाहे पास ।5।

उलट- पलट सब हो गए, रिश्तों के आधार ।
निगल गई विश्वास को, मतलब की दीवार ।6।

रिश्तों में जो डालते , अपनेपन की  खाद ।
वही सिर्फ संसार में, चखते इसका स्वाद ।7।

सुशील सरना / 3-3-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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