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ग़ज़ल :- बाढ़ का हद से गुजरना अच्छा

 ग़ज़ल :- बाढ़ का हद से गुजरना अच्छा
 
बाढ़ का हद से गुजरना अच्छा ,
गाँव का फिर से संवरना अच्छा |
 
इस जगह माँ की याद आती है ,
इस जगह थोडा ठहरना अच्छा |
 
सिर्फ ख्वाबों का बसर होता है ,
रात का सुबह बिखरना अच्छा |
 
वस्ल का वायदा मुझसे लेना ,
और फिर उसका मुकरना अच्छा |
 
लहरें तह तक खंगाल देती हैं ,
कश्तियाँ देखकर डरना अच्छा |
 
झूठ  के भीड़ की घुटन सच है ,
ऐसे जीने से तो मरना अच्छा |
 
सूरतें हो गयीं सारी विकृत ,
आइनों का ही निखरना अच्छा |
 
 
           += अभिनव अरुण
 

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 14, 2011 at 8:33pm
इस जगह माँ की याद आती है ,
इस जगह थोडा ठहरना अच्छा |
आय हाय, वाह भाई वाह, माँ , नाम ही काफी है,
सूरतें हो गयीं सारी विकृत ,
आइनों का ही निखरना अच्छा |
आइनों को बदलने से सूरत नहीं बदलती , बहुत खूब , दाद कुबूल करें |

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