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ग़ज़ल :- सोच का सन्दर्भ अब कितना इकहरा हो गया

ग़ज़ल :- सोच का सन्दर्भ अब कितना इकहरा हो गया

 

सोच का सन्दर्भ अब कितना इकहरा हो गया ,

आदमी तकनीक के गुलशन का सहरा हो गया | 

 

जड़कटी संस्कृति ने दी रिश्तों को परिभाषा नयी ,

मीडिया के शोर में हर शख्स बहरा हो गया |

 

मैं कि मूल्यों का लिए परचम हूँ लाइन में खड़ा ,

अब ऋचाओं का भी पढना क्या ककहरा हो गया |

 

दिन में हंसिये फावड़े पर रंग सियासत का चढ़ा ,

गाँव का तालाब रातोरात गहरा हो गया |

 

मेरे कांधों पर उम्मीदों के कई ताबूत  हैं ,

और कब्रिस्तान पर लोगों का पहरा हो गया |

 

दौर में बिकने लगीं  इल्मों हुनर की डिग्रियां ,

कह रहे हैं वो कि मुस्तकबिल सुनहरा हो गया |

 

                 - अभिनव अरुण {270404}

 

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Comment by Abhinav Arun on August 23, 2011 at 1:45pm

shukriya virendra jee aapki tippani mera hausla badhayegee "

Comment by Veerendra Jain on August 22, 2011 at 11:41pm
मेरे कांधों पर उम्मीदों के कई ताबूत हैं ,
और कब्रिस्तान पर लोगों का पहरा हो गया

bahut hi achi gazal...Arun ji bahut bahut badhai aapko..
Comment by Abhinav Arun on August 21, 2011 at 4:00pm

bahut abhari hoon BAGI JI & SAURABH JI .apka sneh aur ashish milna jari rahe srijan ki syahi kuchh n kuchh rachti rahegi.thanks ! Thanks !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 21, 2011 at 2:16pm

हर अशार पर अलग-अलग दाद लें. किसे क्या कहें अब.

बहुत-बहुत बधाई, अरुणअभिनवजी.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 21, 2011 at 12:43pm

वाह वाह वाह, अरुण जी प्रत्येक शे'र उच्च मूल्यों को समाहित किये हुए है, जबरदस्त कहन का मुजाहिरा कराया है आपने, कांधो पर उम्मीदों का ताबूत ...वाला शे'र बहुत ही उम्द्दा लगा, कुल मिलाकर एक खुबसूरत ग़ज़ल कही है आपने | बधाई आपको | 

Comment by Abhinav Arun on August 21, 2011 at 10:39am

सोच का सन्दर्भ अब कितना इकहरा हो गया ,

आदमी तकनीक के गुलशन का सहरा हो गया | 

इसे अब भी बदलने की सोच रहा हूँ | कुछ वर्ष पहले लिखी ग़ज़ल में ये मिसरा पहले यूं था -

दर्द और संवेदना का बोझ दोहरा हो गया ,

आदमी तकनीक के हाथो का मोहरा हो गया |

परन्तु आगे के शेरो का काफिया दोषपूर्ण हो जाता | सो बदल दिया है | परिमार्जन की प्रक्रिया चल  रही है निरंतर ...

Comment by Abhinav Arun on August 21, 2011 at 9:25am
शुक्रिया आशीष जी ये सब आप जैसे सुधी प्रशंसकों का स्नेह और उनकी शुभकामनाएं है | आभार !!
Comment by आशीष यादव on August 20, 2011 at 11:49pm

आदरणीय अभिनव अरुण जी,
फिर से आप की एक शानदार ग़ज़ल आई हम लोगो के बीच|
आप को पढना बहुत अच्छा लगता| आपके भाव और समय का मेल बहुत सुन्दर है|
आपकी लेखनी को मेरा नमन

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