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धर्म धुरी है इस जगती की
धर्म सृष्टि का है आधार..
धर्म न्याय से ही सुस्थिर है
इस दुनिया के सब व्यापार.

धर्म सिखाता है बेटे को
माँ का हो पूरा सम्मान..
धर्म मान कर ही सीमा पर
सैनिक देता अपने प्राण ..

सूर्य चन्द्र भी धर्म मान कर
देते हैं प्रकाश उपहार ;
धर्म मान निज वृक्ष फूलते
नदियाँ जल देतीं साभार ...

पत्नी माँ दोनों हैं स्त्री ,
किन्तु पृथक इनका स्थान
माँ माँ है पत्नी है पत्नी,
धर्म कराता इसका ज्ञान...

धर्म राह पर चलकर बेटा
वृद्ध पिता को नहीं भूलता
निज सुख त्याग पितृसेवा कर
अपना जीवन धन्य बनाता...

धर्म मिला था राजनीति में
गौहर का था जब सम्मान
वीर शिवाजी के शासन में
था अक्षुण स्त्री का मान..

धर्म परम इश्वर की वाणी
धर्म सत्य का करता चिंतन
विरत धर्म नर पशुवत जीवित
धर्म श्रेष्ठ जीवन का दर्शन

धर्म नहीं आलोच्य कभी भी
धर्म प्राण है राजनीति का
धर्म जहाँ है विजय वहीँ है
धर्म पिता है न्याय नीति का ..

राजनीति से धर्म हटा कर
किस अनीति पर ले जाओगे;
धर्म हीन कल्पित समाज में
कैसा जीवन जी पाओगे...

स्वार्थ और सुख के दीवाने
नीति धर्म को ये क्या जाने?..
प्रभुता पा मदमस्त हुए है
न्यायोचित कुछ भी न माने

सुख की अमृत की तलाश में
मथते ये सारा भव-सागर
सुधा कलश में ऐसा उलझे
ले आये ये विष की गागर

बाँट रहे हैं विष ये सबको
इस समाज को हमको तुमको
सत्ता सुख छिनने के भय से
नष्ट कर रहे समरसता को

नीति बना कर अपनी चेरी
धर्म बना कर जैसे दास
सत्य मार्ग से विरत दुष्ट अब
पूरी करते दीखते आस

ब्रिजेश कुमार त्रिपाठी

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Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on August 12, 2010 at 8:13pm
धर्म सिखाता है बेटे को
माँ का हो पूरा सम्मान..
धर्म मान कर ही सीमा पर
सैनिक देता अपने प्राण ..

बहुत ही बढ़िया रचना है बृजेश जी.....
Comment by आशीष यादव on August 12, 2010 at 4:52pm
bahut hi sundar kawita hai,

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 12, 2010 at 9:15am
धर्म सिखाता है बेटे को
माँ का हो पूरा सम्मान..
धर्म मान कर ही सीमा पर
सैनिक देता अपने प्राण ..
बहुत बढ़िया बड़े भाई, धर्म की बहुत ही व्यापक व्याख्या किया है आपने अपनी खुबसूरत रचना में, बहुत खूब ,उम्द्दा अभिव्यक्ति और सुंदर प्रस्तुति, धन्यवाद आपको ,

कृपया ध्यान दे...

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