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रोक देता है ज़मीर आ के ख़ता से पहले

तू ज़रा सोच कभी अपनी अदा से पहले
कहीं मर जाये न इक शख्स क़ज़ा से पहले 

इस लिए आज तलक मुझ से ख़ताएँ न हुईं 
रोक देता है ज़मीर आ के ख़ता से पहले 

हो सके तो कभी देखो मेरे घर में आकर 
ऐसी बरसात जो होती है घटा से पहले 

ग़मे जानां की क़सम अश्के मोहब्बत की क़सम 
थे बहुत चैन से हम दौरे वफ़ा से पहले 

वह फ़क़त रंग ही भर्ती रही अफसानों में
सब पहुंच भी गए मंजिल पे सिया से पहले 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 6, 2011 at 11:00am

बधाई.  हर शे’र की कहन जज़्बों का गुलदस्ता है.

वह फ़कत रंग ही भरती रही.. .  वाह-वाह !! ..

वीनस भाई के सुझाव और इशारे पर ग़ौर करेंगी.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 6, 2011 at 10:31am

इस लिए आज तलक मुझ से ख़ताएँ न हुईं 
रोक देता है ज़मीर आ के ख़ता से पहले

 

वाह सिया जी, अच्छी प्रस्तुति पर बधाई |

Comment by वीनस केसरी on October 4, 2011 at 11:37pm

सिया जी,
ग़ज़ल के कुछ शेर लय से भटक रहे हैं, एक बार नजर-ए-सानी कर लें 

Comment by siyasachdev on October 4, 2011 at 10:09pm

वीनस केशरी ji badi masarrat hui ..aapko peshkash pasand aayi ..salamati ho

 

Comment by वीनस केसरी on October 4, 2011 at 9:49pm

सुन्दर ग़ज़ल है सिया जी

कुछ टाईपिंग की त्रुटियाँ हैं उन्हें सही कर लीजिए 

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