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बहती गंगा मॆं,,,,,

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स्वार्थ की चादर, तानकर सॊयॆ हैं सब ॥

न जानॆ कौन सॆ, भ्रम मॆं खॊयॆ हैं सब ॥१॥

समय किसी का, उधार रखता नहीं है,

अपनी करनी पॆ, इसलियॆ रॊयॆ हैं सब ॥२॥

आसमां सॆ नहीं आयॆ,यॆ खूनी दरख्त,

बीज नफ़रत कॆ, हमनॆ ही बॊयॆ हैं सब ॥३॥

अंधा बना दिया है, श्रॆष्ठता की दौड़ नॆ,

सपनॆं सूरज कॊ छूनॆ कॆ,संजॊयॆ हैं सब ॥४॥

किस किस पॆ उंगली,उठाऒगॆ ज़नाब,

यहां बहती गंगा मॆं, हांथ धॊयॆ हैं सब ॥५॥

कल किसी कॆ मुंह सॆ, सुना था "राज",

अपनी अपनी धुन मॆं,यॆ खॊयॆ हैं सब ॥६॥

        कवि-राज बुन्दॆली,,,,,,

        २५/०१/२०१२

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Comment by rajesh kumari on January 26, 2012 at 2:18pm

bahut umda rachna.

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