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ज़मीर इसका कभी का मर गया है ,
न जाने कौन है किस पर गया है.

दीवारें घर के भीतर बन गयीं हैं,
सियासतदां सियासत कर गया है.

तरक्की का नया नारा न दो अब ,
खिलौनों से मेरा मन भर गया है.

कोई स्कूल की घंटी बजा दे,
ये बच्चा बंदिशों से डर गया है.

बहुत है क्रूर अपसंस्कृति का रावण ,
हमारे मन की सीता हर गया है.

शहर से आयी है बेटे की चिट्ठी,
कलेजा माँ का फिर से तर गया है.

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on October 9, 2010 at 7:56am
ये मेरी पसंदीदा गज़ल है. आपने भी पसंद की , हौसला बढ़ा.आभार!!
Comment by विवेक मिश्र on October 3, 2010 at 6:01pm
/दीवारें घर के भीतर बन गयीं हैं,
सियासतदां सियासत कर गया है./
- बड़ी गहरी बात कही है. मन 'वाह-वाह' किये बिना नहीं रह सका.
Comment by Hilal Badayuni on October 3, 2010 at 12:36pm
bahut khoob waah waah
Comment by Keshav Bhatli on October 2, 2010 at 1:40pm
Iss Site par Nya aaya hun. Bahut kuch parne ko mil rha hai .AAPKI LIKHI YEH GAZAL BAHUT ACHI LAGI. BADHAI.
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on October 1, 2010 at 4:40pm
ज़मीर इसका कभी का मर गया है ,
न जाने कौन है किस पर गया है.

अरुण जी बहुत ही सुंदर रचना है.....ऐसेही लिखते रहे और हमे आपकी रचना पढ़ने को मिलती रहे यही कामना है...
Comment by Pooja Singh on October 1, 2010 at 1:00pm
प्रणाम "
,तरक्की का नया नारा न दो अब ,
खिलौनों से मेरा मन भर गया है."समाजिक सरोकार से परिपूर्ण यह व्यग भरीगजल बहुत बढिया है | बधाई आपको |
Comment by Bala on September 30, 2010 at 11:53am
Shri Arunjee

Bahut achha.

Vadhai.

Bala

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 26, 2010 at 1:35pm
बहुत है क्रूर अपसंस्कृति का रावण ,
हमारे मन की सीता हर गया है.

शहर से आयी है बेटे की चिट्ठी,
कलेजा माँ का फिर से तर गया है.

वाह वाह , बहुत खूब अरुण साहब, सुंदर अभिव्यक्ति है, आशिकी, मौशिकी, मैखाना, साकी से इत्तर सामाजिक संवेदनाओं से जुड़े शे'र अब कहने लगे है यह बड़ी ही ख़ुशी की बात है, बहुत बहुत बधाई इस खुबसूरत ग़ज़ल पर,

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