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हम कौन से भले हैं....

न सोंच दिल कि तुम्हारी खता कहाँ थी
कर ले ख़्याल इतना हमारी वफा कहाँ थी

भड़कती नहीं चिंगारियां संग और आब से
रंजिश में तेरी भी दिलक़श ब्यां कहाँ थी

गै़र की बदसुलूकी से आज तुं क्यूं परेशां
बेअदबी पर खुद की शर्मो हया कहाँ थी

गै़र की करतुतो पर दिलों में शुगबूगाहट
अपनी ख़ता का दिल में चर्चा कहाँ थी

औरों से चाहत तेरी तमन्ना तहजीब की
ईमानदारी तेरी पेशगी में जवां कहाँ थी

इक वजह अदावत की दुनिया में खुदगर्जी
जब बनी थी कायनात ये दास्तां कहाँ थी

करें कद्र जज़्बातों का शरद एहसास जो
फिर दिल कहेगा दिलों में दुरियां कहाँ थी

सुबोध कुमार शरद

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Comment by Subodh kumar on September 26, 2010 at 4:07pm
dhanyabadd ashish jee...
Comment by Subodh kumar on September 26, 2010 at 4:07pm
dhanybaad bagi jee..
Comment by आशीष यादव on September 26, 2010 at 11:53am
वाह सरद जी, स्वयं को प्रतिक बनाकर मानव जाति की भावानावों को प्रकट किया है| एक सुन्दर ग़ज़ल|
भूरि भूरि प्रसंशा के काबिल है यह रचना|

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 26, 2010 at 10:58am
गै़र की करतुतो पर दिलों में शुगबूगाहट
अपनी ख़ता का दिल में चर्चा कहाँ थी,

वाह वाह सुबोध साहिब भाई क्या कमाल की ग़ज़ल पढ़ी है आपने, स्वयम की तरफ उठती उँगलियाँ, बहुत ही खुबसूरत,

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