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राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- २४

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

पहले भी कई बार...

 

पहले भी कई बार

जब चाँद का शिकारा

आस्मान से उतर चुका हो

और तारे भी लौट चुके हों घर को

दूर... बाद्लों के  पहाड़ के  पीछे चिनार की बस्तियों में

जब दूर दूर फैली लबबस्ता खलाओं में

रात ने लिख दी हो ज़िन्दगी की शबनमी नज़्म

जब आहटों से बसी गलियों में

खुलने को हो आये हों

कायनात के  सुफैद दरीचे

जब दरख्तों से हवा की सरगोशियों का सिलसिला

टूटने को हुआ हो

ऐसे ही सुकूत के टूटते लम्हों में

पहले भी कई बार देखा है तुम्हें

उफुक की सीमाब किरनों से ज़मीं पे उतरते.

 

© राज़ नवादवी

सोशल वर्क हॉस्टल, नई दिल्ली

(०६/०२/१९९३)

 

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