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कवितायेँ कैसे बनती है...............!!

कविताये कैसे बनती है 

कुछ खबर नहीं होती 
बस ..........................
दिल की कुछ भावनाएं होती है 
जो शब्दों का रूप लेकर 
कागज पर उतर आती है
और कवितायेँ बन जाती है
कवितायेँ कैसे बनती है........................
कवितायेँ .................
कभी दर्द से जन्म लेती है
कभी गम का रूप होती है
कभी दिल की ख़ुशी की पहचान बनती है
तो कभी विरोध के लिए लिखी जाती है
कवितायेँ कैसे.....................
कवितायेँ .................
जो सच्चाई से भरी होती है
कभी समाज के लिए , देश के लिए 
तो कभी किसी खास के लिए लिखी जाती है
कवितायेँ जिनमे नफरत नहीं होती
कवितायेँ तो बस प्यार से लिखी जाती है
कवितायेँ कैसे.....................
कवितायेँ.................
जो समाज का आईना होती है 
कवितायेँ ................
जो "बस यूँ ही" बन जाती है 
कवितायेँ .............
जो उडती है मन के आकाश में 
कवितायेँ ........
जिनकी कोई सीमा नहीं होती
कवितायेँ ...................
जो एक कवि/ कवियत्री की भावनाओ को व्यक्त करती है
कवितायेँ कैसे........................
कवितायेँ .....................
जो खुद में बहुत कुछ समेटे होती है
कभी-कभी बेनाम ही रह जाती है
कवितायेँ.................
तलाश करती है अपने अस्तित्व को 
प्रकाशन विभागों की दुनिया में 
लेकिन अधिकतर खाली हाथ ही लौट आती है
कविताये कैसे............
कवितायेँ ..............
होती तो है एक कवि/कवयित्री के विचारो के अक्स 
मगर पूछो उनसे कि कवितायेँ कैसे बनती है
तो एक ही जवाब आता है.................
कवितायेँ न जाने कैसे बनती है........
कवितायेँ तो "बस यूँ ही" बनती है ...
जैसे भी बनती खुद-ब-खुद बनती है
कवितायेँ कैसे बनती है...............!!

Views: 1430

Comment

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Comment by Sonam Saini on August 17, 2012 at 11:26am

आदरणीय सुरेंदर कुमार जी नमस्कार
जय श्री राधे
रचना को पसंद करने के लिए आभार!

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 13, 2012 at 7:20pm
 
कवितायेँ न जाने कैसे बनती है........
कवितायेँ तो "बस यूँ ही" बनती है ..
सोनम जी अच्छा परिभाषित किया आप ने कविताओं को ..सच में ये बनाये नहीं बनती लेकिन जब मन में भावों के बादल उमड़ने शुरू हो जाते हैं तो रोके नहीं रुकते बरस कर ही रुकते हैं और इंतजार होता है  एक कागज और कलम का ...कितनी जल्दी मिल जाए..हाथ में आये मोती लुढकते सागर में गोता लगाने न चले जाएँ  ...कवि का मन बड़ी लम्बी उड़ान भरता है कल्पनाओं का विशाल आसमा आंचल पसारे उसे चुम्बक सा खींचता ही चला जाता है ...समाज का दर्द , खशी गम सब झलक जाता है ...काश सब सच्चाई का  दामन थामे उड़ते चलें .. बधाई ..
जय श्री राधे 
भ्रमर ५ 
Comment by Sonam Saini on August 9, 2012 at 9:27am

Thanks a lot Arun ji

Comment by Sonam Saini on August 9, 2012 at 9:26am

ये कविता आपके दिल तक पहुची , ये इसकी और मेरी दोनों की ही खुस्किस्मती है,
आपका अनमोल समय देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by Sonam Saini on August 9, 2012 at 9:24am

इतनी सारी तारीफ करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद अम्बरीश जी

Comment by Sonam Saini on August 9, 2012 at 9:23am

आदरणीय कुशवाहा सर ,
कविता को पसंद करने के लिए और तारीफ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Sonam Saini on August 9, 2012 at 9:22am

Thank you very much ashok kumar sir

Comment by Sonam Saini on August 9, 2012 at 9:21am

kavita ko pasand krne ke liye dil se aabhar rekha mam, thank you very much

Comment by Sonam Saini on August 9, 2012 at 9:21am

Bahut bahut shukriya yogi sir

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 8, 2012 at 11:56am

वाह कविता की इतनी सुन्दर परिभाषा क्या बात है , बधाई स्वीकार कीजिये सोनम जी

कृपया ध्यान दे...

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