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मुक्तिका... क्यों है? ------- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका...

क्यों है?

संजीव 'सलिल'
*
रूह पहने हुए ये हाड़ का पिंजर क्यों है?
रूह सूरी है तो ये जिस्म कलिंजर क्यों है??

थी तो ज़रखेज़ ज़मीं, हमने ही बम पटके हैं.
और अब पूछते हैं ये ज़मीं बंजर क्यों है??

गले मिलने की है ख्वाहिश, ये संदेसा भेजा.
आये तो हाथ में दाबा हुआ खंजर क्यों है??

नाम से लगते रहे नेता शरीफों जैसे.
काम से वो कभी उड़िया, कभी कंजर क्यों है??

उसने बख्शी थी हमें हँसती हुई जो धरती.
आज रोती है बिलख, हाय ये मंजर क्यों है?

***********************

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 10, 2010 at 1:07pm
थी तो ज़रखेज़ ज़मीं, हमने ही बम पटके हैं.
और अब पूछते हैं ये ज़मीं बंजर क्यों है??

बहुत खूब आचार्य जी, सुंदर अभिव्यक्ति पर बधाई,
Comment by DEEP ZIRVI on October 9, 2010 at 11:47pm
दे सके न कभी परवाज़ जो आकाश कभी ;
उन के कहने ही पे कतरे गये ये पर क्यों हैं.deepzirvi9815524600
Comment by sanjiv verma 'salil' on October 9, 2010 at 2:04pm
thanks.

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