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Sanjiv verma 'salil''s Blog (225)

दोहा मुक्तिका: नेह निनादित नर्मदा संजीव 'सलिल'

दोहा मुक्तिका:

नेह निनादित नर्मदा

संजीव 'सलिल'

*

नेह निनादित नर्मदा, नवल निरंतर धार.

भवसागर से मुक्ति हित, प्रवहित धरा-सिंगार..



नर्तित 'सलिल'-तरंग में, बिम्बित मोहक नार.

खिलखिल हँस हर ताप हर, हर को रही पुकार..



विधि-हरि-हर तट पर करें, तप- हों भव के पार.

नाग असुर नर सुर करें, मैया की जयकार..



सघन वनों के पर्ण हैं, अनगिन बन्दनवार.

जल-थल-नभचर कर रहे, विनय करो उद्धार..



ऊषा-संध्या का दिया, तुमने रूप निखार.

तीर…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 27, 2013 at 6:30am — 26 Comments

लघुकथा: बड़ा / संजीव 'सलिल'

लघुकथा: बड़ा
*
बरसों की नौकरी के बाद पदोन्नति मिली.

अधिकारी की कुर्सी पर बैठक मैं खुद को सहकर्मियों से ऊँचा मानकर डांट-डपटकर ठीक से काम करने की नसीहत दे घर आया. देखा नन्ही बिटिया कुर्सी पर खड़ी होकर ताली बजाकर कह रही है 'देखो, मैं सबसे अधिक बड़ी हो गयी.'

जमीन पर बैठे सभी बड़े उसे देख हँस रहे हैं. मुझे कार्यालय में सहकर्मियों के चेहरों की मुस्कराहट याद आई और तना हुआ सिर झुक गया.

*****

Added by sanjiv verma 'salil' on February 20, 2013 at 6:30pm — 5 Comments

ढपोरशंख (लघुकथा) / संजीव ’सलिल’

सामयिक लघुकथा:

ढपोरशंख                                                                             '

                                                                                       *

कल राहुल के पिता उसके जन्म के बाद घर छोड़कर सन्यासी हो गए थे, बहुत तप किया और बुद्ध बने. राहुल की माँ ने उसे बहुत अरमानों से पाला-पोसा बड़ा किया पर इतिहास में कहीं राहुल का कोई योगदान नहीं दीखता.



 आज राहुल के किशोर होते ही उसके पिता आतंकवादियों द्वारा मारे गए. राहुल की माँ ने उसे…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 17, 2013 at 10:00am — 16 Comments

गीत : ... सच है संजीव 'सलिल'

*

कुछ प्रश्नों का कोई भी औचित्य नहीं होता यह सच है.

फिर भी समय-यक्ष प्रश्नों से प्राण-पांडवी रहा बेधता...

*

ढाई आखर की पोथी से हमने संग-संग पाठ पढ़े हैं.

शंकाओं के चक्रव्यूह भेदे, विश्वासी किले गढ़े है..

मिलन-क्षणों में मन-मंदिर में एक-दूसरे को पाया है.

मुक्त भाव से निजता तजकर, प्रेम-पन्थ को अपनाया है..

ज्यों की त्यों हो कर्म चदरिया मर्म धर्म का इतना जाना-

दूर किया अंतर से अंतर, भुला पावना-देना सच है..



कुछ प्रश्नों का कोई भी औचित्य…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 16, 2013 at 7:30pm — 10 Comments

हिंदी छन्द : त्रिभंगी / संजीव सलिल

त्रिभंगी सलिला:

ऋतुराज मनोहर...

संजीव 'सलिल'

*

ऋतुराज मनोहर, प्रीत धरोहर, प्रकृति हँसी, बहु पुष्प खिले.

पंछी मिल झूमे, नभ को चूमे, कलरव कर भुज भेंट मिले..

लहरों से लहरें, मिलकर सिहरें, बिसरा शिकवे भुला गिले.

पंकज लख भँवरे, सजकर सँवरे, संयम के दृढ़ किले हिले..

*

ऋतुराज मनोहर, स्नेह सरोवर, कुसुम कली मकरंदमयी.

बौराये बौरा, निरखें गौरा, सर्प-सर्पिणी, प्रीत नयी..

सुरसरि सम पावन, जन मन भावन, बासंती नव कथा जयी.

दस दिशा तरंगित, भू-नभ…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 12, 2013 at 8:30pm — 12 Comments

द्विपदियाँ; संजीव 'सलिल'

चंद द्विपदियाँ;

संजीव 'सलिल'

*

जब तक था दूर कोई इसे जानता न था.

तुमको छुआ तो लोहे से सोना हुआ 'सलिल'.

*

वीरानगी का क्या रहा आलम न पूछिए.

दिल ले लिया तुमने तभी आबाद यह हुआ..

*

जाता है कहाँ रास्ता? कैसे बताऊँ मैं??

मुझ से कई गए न तनिक रास्ता हिला..

*

बस में नहीं दिल के, कि बस के फिर निकल सके.

परबस न जो हुए तो तुम्हीं आ निकाल दो..

*

जो दिल जला है उसके दिल से दिल मिला 'सलिल'

कुछ आग अपने दिल में लगा- जग उजार दे.. ..…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 12, 2013 at 11:00am — 6 Comments

गीत : आशियाना ... संजीव 'सलिल'

गीत :

आशियाना ...

संजीव 'सलिल'

*

धरा की शैया सुखद है, 

नील नभ का आशियाना ...

संग लेकिन मनुज तेरे 

कभी भी कुछ भी न जाना ...

*

जोड़ता तू फिर रहा है,

मोह-मद में घिर रहा है।

पुत्र है परब्रम्ह का पर 

वासना में तिर रहा है।

पंक में पंकज सदृश रह-

सीख पगले मुस्कुराना ...

*

उग रहा है सूर्य नित प्रति,

चाँद संध्या खिल रहा है। 

पालता है जो किसी को, 

वह किसी से पल रहा…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 6, 2013 at 5:00pm — 8 Comments

अभिनव प्रयोग- उल्लाला मुक्तक: -संजीव 'सलिल'

अभिनव प्रयोग-

उल्लाला मुक्तक:

संजीव 'सलिल'

*

उल्लाला है लहर सा,

किसी उनींदे शहर सा.

खुद को खुद दोहरा रहा-

दोपहरी के प्रहर सा.

*

झरते पीपल पात सा,

श्वेत कुमुदनी गात सा.

उल्लाला मन मोहता-

शरतचंद्र मय रात सा..

*

दीप तले अँधियार है,

ज्यों असार संसार है.

कोशिश प्रबल प्रहार है-

दीपशिखा उजियार है..

*

मौसम करवट बदलता,

ज्यों गुमसुम दिल मचलता.

प्रेमी की आहट सुने -

चुप प्रेयसी की…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 3, 2013 at 2:30pm — 6 Comments

उल्लाला मुक्तिका: दिल पर दिल बलिहार है -संजीव 'सलिल'

उल्लाला मुक्तिका:

दिल पर दिल बलिहार है

संजीव 'सलिल'

*

दिल पर दिल बलिहार है,

हर सूं नवल निखार है..



प्यार चुकाया है नगद,

नफरत रखी उधार है..



कहीं हार में जीत…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 2, 2013 at 4:30pm — 9 Comments

उल्लाला गीत: जीवन सुख का धाम है -संजीव 'सलिल

अभिनव प्रयोग-

उल्लाला गीत:

जीवन सुख का धाम है

संजीव 'सलिल'

*

जीवन सुख का धाम है,

ऊषा-साँझ ललाम है.

कभी छाँह शीतल रहा-

कभी धूप अविराम है...*

दर्पण निर्मल नीर सा,

वारिद, गगन, समीर सा,

प्रेमी युवा अधीर सा-

हर्ष, उदासी, पीर सा.

हरी का नाम अनाम है

जीवन सुख का धाम है...

*

बाँका राँझा-हीर सा,

बुद्ध-सुजाता-खीर सा,

हर उर-वेधी तीर सा-

बृज के चपल अहीर सा.

अनुरागी निष्काम है

जीवन सुख का धाम…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 1, 2013 at 10:30am — 6 Comments

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत: संजीव 'सलिल'

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:

लोकतंत्र की वर्ष गांठ पर

संजीव 'सलिल'

*

लोकतंत्र की वर्ष गांठ पर

भारत माता का वंदन...



हम सब माता की संतानें,

नभ पर ध्वज फहराएंगे.

कोटि-कोटि कंठों से मिलकर

'जन गण मन' गुन्जायेंगे.

'झंडा ऊंचा रहे हमारा',

'वन्दे मातरम' गायेंगे.

वीर शहीदों के माथे पर

शोभित हो अक्षत-चन्दन...



नेता नहीं, नागरिक बनकर

करें देश का नव निर्माण.

लगन-परिश्रम, त्याग-समर्पण,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 26, 2013 at 8:00am — 12 Comments

षटपदियाँ

सामयिक षटपदियाँ:

संजीव 'सलिल'

*

मानव के आचार का स्वामी मात्र विचार.

सद्विचार से पाइए, सुख-संतोष अपार..

सुख-संतोष अपार, रहे दुःख दूर आपसे.

जीवन होगा मुक्त, मोहमय महाताप से..

कहे 'सलिल' कुविचार, नाश करते दानव के.

भाग्य जागते निर्बल होकर भी मानव के..

***

हार न सकती मनीषा, पशुपति दें आशीष.

अपराजेय जिजीविषा, सदा साथ हों ईश..

सदा साथ हों ईश, कैंसर बाजी हारे.

आया है युवराज जीत, फिर ध्वज फहरा रे.

दुआ 'सलिल' की, मौत इस तरह मार न…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 24, 2013 at 3:00pm — 6 Comments

मत्त गयंद (सवैया): संजीव 'सलिल'

मत्त गयंद (सवैया):
संजीव 'सलिल'
*
मत्त गयन्द सुछन्द  मनोहर, ज्यों गुलकंद मधुर मन भाया
आत्मज सम यश-कीर्ति बढ़ा, कवि-तात का लाड़ निरंतर पाया
झूम उठे थे शेष न शेष रहा धीरज, जब छंद सुनाया.
घबराये नर-नार कहें, क्यों इंद्र ने भू पर वज्र चलाया..
*

Added by sanjiv verma 'salil' on January 21, 2013 at 5:00pm — 3 Comments

सामयिक गीत: पंच फैसला... संजीव 'सलिल'

सामयिक गीत:

पंच फैसला...

संजीव 'सलिल'

*

पंच फैसला सर-आँखों,

पर यहीं गड़ेगा लट्ठा...

*

नाना-नानी, पिता और माँ सबकी थी ठकुराई.

मिली बपौती में कुर्सी, क्यों तुम्हें जलन है भाई?

रोजगार है पुश्तों का, नेता बन भाषण देना-

फर्ज़ तुम्हारा हाथ जोड़, सर झुका करो पहुनाई.

सबको अवसर? सब समान??

सुन-कह लो, करो न ठट्ठा...

*

लोकतंत्र है लोभतन्त्र, दल दाम लगाना जाने,

भौंक तन्त्र को ठोंकतन्त्र ने दिया कुचल…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 21, 2013 at 4:00pm — 3 Comments

मुक्तक : रूप की आरती (संजीव 'सलिल')

मुक्तक

रूप की आरती

संजीव 'सलिल'

*

रूप की आरती उतारा कर.

हुस्न को इश्क से पुकारा कर.

चुम्बनी तिल लगा दे गालों पर-

तब 'सलिल' मौन हो निहारा कर..

*

रूप होता अरूप मानो भी..

झील में गगन देख जानो भी.

देख पाओगे झलक ईश्वर की-

मन में संकल्प 'सलिल' ठानो भी..

*

नैन ने रूप जब निहारा है,

सारी दुनिया को तब बिसारा है.

जग कहे वन्दना तुम्हारी थी-

मैंने परमात्म को गुहारा है..

*

झील में कमल खिल रहा कैसे.

रूप…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 21, 2013 at 9:30am — 3 Comments

गीत : भूल जा / संजीव 'सलिल'

भूल जा

संजीव 'सलिल'

*

आईने ने कहा: 'सत्य-शिव' ही रचो,

यदि नहीं, कौन 'सुन्दर' कहाँ है कहो?

लिख रहे, कह रहे, व्यर्थ दिन-रात जो-

ढाई आखर ही उनमें तनिक तुम तहो..'



ज़िन्दगी ने तरेरीं निगाहें तुरत,

कह उठी 'जो हकीकत नहीं भूलना.

स्वप्न तो स्वप्न हैं, सच समझकर उन्हें-

गिर पड़ोगे, निराधार मत झूलना.'



बन्दगी थी समर्पण रही चाहती,

शेष कुछ भी न बाकी अहम् हो कहीं.

जोड़ मत छोड़ सब, हाथ रीते रहें-

जान ले, साथ जाता कहीं कुछ…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 20, 2013 at 2:00pm — 6 Comments

पाठक नामा- मेरी आपबीती: बेनज़ीर भुट्टो 2

पाठक नामा- मेरी आपबीती: बेनज़ीर भुट्टो 2  

संजीव 'सलिल'

*

१९७१ के बंगला देश समर पर बेनजीर :



==''...मैं नहीं देख पाई कि लोकतान्त्रिक जनादेश की…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 17, 2013 at 6:54pm — 3 Comments

राजनैतिक षड्यंत्र का शिकार हिंदी...संजीव वर्मा 'सलिल'

विशेष आलेख

      राजनैतिक षड्यंत्र का शिकार हिंदी …

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 14, 2013 at 12:00pm — 10 Comments

पाठक नामा- मेरी आपबीती: बेनज़ीर भुट्टो पर संजीव 'सलिल'

पाठकनामा:

संजीव 'सलिल'

*

गत दिनों बेनजीर भुट्टो की लिखी पुस्तक मेरी आपबीती पढ़ी. मेरे पिता की हत्या, अपने ही घर में बंदी, लोकतंत्र का मेरा पहला अनुभव, बुलंदी के शिखर छूते ऑक्सफ़ोर्ड के सपने, जिया उल हक का विश्वासघात, मार्शल लॉ को लोकतंत्र की चुनौती, सक्खर जेल में एकाकी कैद, करचे जेल में- अपनी माँ की पुरानी कोठारी में बंद, सब जेल में अकेले और २ वर्ष, निर्वासन के वर्ष, मेरे भाई की मौत, लाहौर वापसी और १९८६ का कत्ले-आम, मेरी शादी, लोकतंत्र की नयी उम्मीद, जनता की जीत,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 12, 2013 at 8:00pm — 6 Comments

हाइकु मुक्तिका: संजीव 'सलिल'

हाइकु मुक्तिका:संजीव 'सलिल'

*

जग माटी का

एक खिलौना, फेंका

बिखरा-खोया.

फल सबने

चाहे पापों को नहीं

किसी ने ढोया.

*

गठरी लादे

संबंधों-अनुबंधों

की, थक-हारा.

मैं ढोता, चुप

रहा- किसी ने नहीं

मुझे क्यों ढोया?

*

करें भरोसा

किस पर कितना,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 10, 2013 at 7:30pm — 10 Comments

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