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ढपोरशंख (लघुकथा) / संजीव ’सलिल’

सामयिक लघुकथा:

ढपोरशंख                                                                             '
                                                                                       *
कल राहुल के पिता उसके जन्म के बाद घर छोड़कर सन्यासी हो गए थे, बहुत तप किया और बुद्ध बने. राहुल की माँ ने उसे बहुत अरमानों से पाला-पोसा बड़ा किया पर इतिहास में कहीं राहुल का कोई योगदान नहीं दीखता.


 आज राहुल के किशोर होते ही उसके पिता आतंकवादियों द्वारा मारे गए. राहुल की माँ ने उसे बहुत अरमानों से पाला-पोसा बड़ा किया पर देश के निर्माण में कहीं राहुल का कोई योगदान नहीं दीखता.

 सबक : ढपोरशंख किसी भी युग में हो ढपोरशंख ही रहता है.

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Comment by sanjiv verma 'salil' on February 26, 2013 at 7:31am

सत्यनारायण जी
आपका बहुत-बहुत आभार.

Comment by Satyanarayan Singh on February 20, 2013 at 7:02pm

आदरणीय आचार्य जी, सामायिक, तुलनात्मक और  लघुकथा के माध्यम से प्रेरक व्यंग है. सादर बधाई.

Comment by sanjiv verma 'salil' on February 20, 2013 at 6:45pm

राम शिरोमणि जी, संदीप जी
लघुकथा आपको रुची तो मेरा लेखन कर्म सार्थक हो गया.

Comment by sanjiv verma 'salil' on February 20, 2013 at 6:40pm

सौरभ जी, राजेश जी, प्राची जी, अशोक जी, आरती जी, बृजेश जी, तुषार जी, संदीप जी, वेदिका जी

आपकी गुणग्राहकता और संवेदनशीलता को नमन.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 19, 2013 at 4:17pm

आदरणीय संजीव जी,

सामयिक लघुकथा के लिए बहुत बहुत बधाई..

इस कथा के गठन और शिल्प की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है.

कथा का शीर्षक बिलकुल चुन कर रखा गया है... दो राहुल की तुलना का ये सार्थक ख्याल गज़ब का लगा. 

पुनः बधाई .सादर.

Comment by वेदिका on February 19, 2013 at 4:12pm

आदरणीय संजीव ’सलिल’ जी !

                             नमस्कार!

बहुत सटीक व्यंग ... बरबस ही कथा के अंत में मुस्कान आजाती है। 

वाह ...

शुभकामनायें !!!

Comment by sandeep tomar on February 19, 2013 at 3:46pm

मजेदार बात  ये है कि जिन दो राहुलो की तुलना हो रही है उनमे कोई तुलना ही नहीं है फिर भी लघु कथा तो अपनी बात कह गयी। वह मज़ा आ गया पढ़कर 

Comment by sandeep tomar on February 19, 2013 at 3:44pm

लघु कथाकार जगदीश कश्यप की याद आती है जब वो नागरिक लघु कथा संग्रह में लघु कथा के तरीके बताते हैं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 19, 2013 at 11:17am

आदरणीय सलिल जी चंद शब्दों में युगों का तुलनात्मक विश्लेषण कर एक सटीक व्यंग्य द्वारा बहुत बड़ी बात कही लघु कथा शीर्षक के साथ पूर्णतः न्याय कर रही है|बधाई आपको 

Comment by Aarti Sharma on February 18, 2013 at 4:46pm

प्रणाम सर..अति सुन्दर और प्रेरक लघुकथा पर बधाई स्वीकारें ..

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