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शब्द-तर्पण: माँ-पापा संजीव 'सलिल'

शब्द-तर्पण:
माँ-पापा
संजीव 'सलिल'
*
माँ थीं आँचल, लोरी, गोदी, कंधा-उँगली थे पापाजी.
माँ थीं मंजन, दूध-कलेवा, स्नान-ध्यान, पूजन पापाजी..
*
माँ अक्षर, पापा थे पुस्तक, माँ रामायण, पापा गीता.
धूप सूर्य, चाँदनी चाँद,  चौपाई माँ, दोहा पापाजी..
*
बाती-दीपक, भजन-आरती, तुलसी-चौरा, परछी आँगन.
कथ्य-बिम्ब, रस-भाव, छंद-लय, सुर-सरगम थे माँ-पापाजी..
*
माँ ममता, पापा अनुशासन, श्वास-आस, सुख-हर्ष अनूठे.
नाद-थाप से, दिल-दिमाग से, माँ छाया तरु थे पापाजी..
*
इनमें वे थे, उनमें ये थीं, पग-प्रयास, पथ-मंजिल जैसे.
ये अखबार, आँख-चश्मा वे, माँ कर की लाठी पापाजी..
*
माला-जाप, भाल अरु चंदन, सब उपमाएँ लगतीं बौनी,
माँ धरती सी क्षमा दात्री,  नभ नीलाभ अटल पापाजी..
*
माँ हरियाली पापा पर्वत, फूल और फल कह लो चाहे.
माँ बहतीं  थीं 'सलिल'-धार सी, कूल-किनारे थे पापाजी..
*

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 9, 2012 at 10:20pm

जो हैं वे क्या हैं जब वे नहीं होते तब पता चलता है और फिर बना शून्य उन्हें तस्वीरों की सीमाओं से भी निकाल कर स्मृतियों और फिर अनुमान के जगत में प्रतिस्थापित कर देता है.  आचार्यवर, आपका शब्द-तर्पण सीता द्वारा सैकत-तर्पण की स्मृति दिला गया  --जो बन सका समर्पित किया, सादर किया. आपकी प्रस्तुत संवेदनशील रचना समस्त कृतज्ञ पुत्र की ओर से नमन है.

Comment by sanjiv verma 'salil' on October 9, 2012 at 8:07pm

प्राची जी, संदीप जी आपको रचना रुची तो मेरा लेखन सार्थक हो गया.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 9, 2012 at 1:08pm

आदरणीय सर जी सादर
बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति सर जी
ह्रदय से बधाई आपको इस सुन्दर रचना हेतु

Comment by sanjiv verma 'salil' on October 9, 2012 at 10:19am
अजय जी, अशोक जी , श्याम जी, राजेश जी, धर्मेन्द्र जी, सीमा जी
आप सब शब्द तर्पण में सहभागी हुए. . तर्पण कर मैं और मेरी कलम दोनों धन्यता अनुभव कर रहे हैं.
Comment by Ashok Kumar Raktale on October 9, 2012 at 8:14am

परम आदरणीय सलिल जी

                     सादर प्रणाम, बहुत सुन्दर रचना हर पंक्ति अनुपम है. हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by ajay sharma on October 8, 2012 at 9:59pm

ky kaho nishabbd ho gaya ,  shabd sanyojan , vyanjana , bhav, bimb ,bhasha sab dristikod se baut hi behatreen prastuti

 

Comment by seema agrawal on October 8, 2012 at 7:33pm

अनूठा शब्द तर्पण ...  जीवन  की अनमोल थातीं होती हैं वे  स्मृतियाँ  जिनसे माँ-पिता का साथ जुडा होता है ...बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर कृति के लिए  आदरणीय संजीव जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 6, 2012 at 10:11pm

आदरणीय संजीव सलिल जी,

सादर नमन!

आपकी रचनाओं का हमेशा इंतज़ार रहता है. शब्द भाव तर्पण , माता पिता कि स्तुति में, स्मृति में अभिव्यक्त के गयी उत्कृष्टतम रचना....हर पंक्ति में अखंडित ज़िन्दगी है इस भावांजलि हेतु हार्दिक साधुवाद व बहुत बहुत बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 6, 2012 at 6:00pm

माला-जाप, भाल अरु चंदन, सब उपमाएँ लगतीं बौनी, 
माँ धरती सी क्षमा दात्री,  नभ नीलाभ अटल पापाजी..
बहुत प्रभावशाली पंक्तियाँ माता पिता दोनों के ही साए में  बच्चा  बड़ा होता है दोनों   का ही बराबर महत्व है जो आपकी रचना में भली भाँति उभर कर आया है इस अनूठी  उत्कृष्ट रचना के लिए बहुत बहुत बधाई सलिल जी 

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