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१. मंहगाई

दिल को देती है तन्हाई,
कभी ना होती उसकी भरपाई !
तुम क्या जानों पीर पराई ,
क्यों सखा सजनी, ना सखा मंहगाई !!

२. नेता

वो जब भी आये बलईयाँ लेता ,
सबके हाल पर चुटकी लेता !
रोज नये आश्वासन देता,
क्यों सखी साजन, ना सखी नेता !!

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Comment by Albela Khatri on August 21, 2012 at 8:07pm

वाह वाह भाई नवल जी,  बहुत उम्दा कह-मुकरियां हैं..... बस कहीं कहीं  मात्राओं में  कमी-बढ़ोत्तरी  हो रही है...अगर  ये सुधार कर लें तो बेहतर होगा
सादर

१. मंहगाई


दिल को देती है तन्हाई,
कभी ना होती उसकी भरपाई !___________घर घर इसने आग लगाई
तुम क्या जानों पीर पराई ,
क्यों सखा सजनी, ना सखा मंहगाई !!______क्यों सखि सजनी ? नहिं मंहगाई

२. नेता

वो जब भी आये बलईयाँ लेता ,   __________वो जब आये, मुझे रुलाये
सबके हाल पर चुटकी लेता !  ____________मरहम कह कर नमक लगाये
रोज नये आश्वासन देता,
क्यों सखी साजन, ना सखी नेता !!_________क्यों सखि साजन ?  नहिं नहिं नेता

Comment by राजेश 'मृदु' on August 21, 2012 at 6:18pm

बड़ी उम्‍दा मुकरियां लिखते हैं आप, बधाई

कृपया ध्यान दे...

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"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
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