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अभी तो शहर मैं हंगामा बहुत है

अभी तो शहर मैं हंगामा बहुत है
फिर इस के बाद इक सन्नाटा बहुत है

हवाओं इक ज़रा झोंका इसे भी
चीरगे राह इतराता बहुत है

भला सूरज से कैसे लड़ सके गा
जो चिंगारी से घबराता बहुत है

हुआ क्या है मेरे चेहरे को आख़िर
उदासी को यह छलकाता बहुत है

मुझे महलों की ज़ीनत मत दिखाओ
मुझे मिट्टी का काशाना बहुत है

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 17, 2010 at 8:11pm
वाह वाह वाह , वाकई बहुत ही उम्द्दा ग़ज़ल और इस शे'र का क्या कहना ..........
भला सूरज से कैसे लड़ सके गा
जो चिंगारी से घबराता बहुत है,

बधाई इस बेहतरीन प्रस्तुति पर नकवी साहिब , दाद कुबूल कीजिये !
Comment by mohd adil on October 16, 2010 at 5:29pm
bhut khoob kha aapne jnb
Comment by Hilal Badayuni on October 16, 2010 at 3:55pm
bahut khoob wafa sahab
hua hai kya mere chehre ko aakhir
udasi ko ye chalkata bahut hai

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