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कोहरे से और बर्फ से, मिला हवा ने हाथ!
अबकी जाड़े में दिया, फिर सूरज को मात !! १

काँप रहा है भीति से, लोक तंत्र का बाघ!
संबंधों में शीत है, और फिजां में आग !!२

रिश्ते नातों में लगा, शीतलता का दाग !
काँप रही है देखिये, कैसे थर-थर आग !!३

फिर पतझड़ की याद में, वृक्ष हो गए म्लान!
छेड़ रहे हैं रात भर, दर्द भरी एक तान !!४

धूप भली लगती कहाँ, याद आ रही रात !
ऊष्ण वस्त्र तो हैं नहीं होना है हिमपात !!५

पहरा देती है हवा, देखो सारी रात !
चिंता तज कर सोइए, खतरे की क्या बात !!६

भीति मृत्यु है जानकर जीते हैं जो लोग!
निर्भय वे रणबांकुरे , हैं श्रद्धा के योग्य !!७

समरसता हो विविध विधि भले अलग हों लोग
प्रभु हो मेरे देश में नीर क्षीर सा योग !!८

अबकी जाड़े में चली, ऐसी लूक बयार!
पोर-पोर कुम्हला गया मानव मन का प्यार!!९

टुकड़े-टुकड़े हो रहा, एक राष्ट्र का भाव !
टुकड़ों में ही बढ़ रहा नाशुक्रों का गाँव !!१०

डॉ. ब्रिजेश कुमार त्रिपाठी

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Comment

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Comment by ghanshyam prasad raturi'nirdosh' on October 22, 2010 at 2:57pm
great, behad achchi aur mahan rachna hai yeh toh.
Comment by anand pandey tanha on October 20, 2010 at 6:20pm
प्रिय ब्रिजेश भाई ,
अत्यंत ही परिपक्व दोहे हैं , लेकिन प्रसव समय पूर्व हो गया है . हार्दिक बधाई .
आनंद पाण्डेय 'तनहा'
Comment by Narendra Vyas on October 20, 2010 at 11:36am
सादर प्रणाम !
ओज पूरण रचना है , इक चेतना प्रदान करती .
साधुवाद !
सुनील गज्जाणी
--

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 17, 2010 at 4:57pm
टुकड़े-टुकड़े हो रहा, एक राष्ट्र का भाव !
टुकड़ों में ही बढ़ रहा नाशुक्रों का गाँव !!

वाह वाह , बहुत सुंदर, सभी दोहे एक से बढ़कर एक है , एक सन्देश देते हुये दोहे , बधाई इस खुबसूरत कृति पर |

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