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कहानी अपनी अपनी सोच

 
मैं जैसे ही अपने एक पुराने मित्र के घर पहुंचा तो उसकी दयनीय हालत देखकर दंग रह गया.....ऐसा लग रहा था की बरसों का मरीज़ हो  अपने कालेज के समय में हमेशा हीरो जैसे टिप टॉप  रहनें वाला मेरा मित्र आज फटे हाल सी जिंदगी बसर कर रहा था I जगह जगह से कटे,फटे मैले कुचैले कपड़े.....और तो और बनियान में भी इतने छेद थे की गिनना भी  आसान नहीं I
मैं तो यह सोच  रहा था की मेरा मित्र अच्छी नौकरी कर रहा है इसलिए  बेहद शान से जी रहा होगा पूरे ठाठ बाठ से.... लेकिन उससे मिलने के बाद मेरी हर धारणा गलत साबित हो गई I  मैंने हैरानी से उससे पूछा दोस्त यह तुम्हें क्या हो गया तुम्हारी रंगीन ज़िंदगी में यह ग्रहण कैसे लग गया....?  क्या हाल बना रखा है अपना ...? ढंग के कपड़े क्यों नहीं पहनते पहले जैसे ...? किसी अच्छे डाक्टर से अपना इलाज बगैरा क्यों नहीं करवाते...? मेरा मित्र झूठी हँसी हँसते हुए बोला ......सब तकदीर के खेल हैं दोस्त शान से ज़िंदगी जी रहे थे हम.....किस्मत के योग ऐसे पलटे कि अर्श से फर्श पर आ गए I कुछ हादसे ऐसे हो गए कि दाने दाने को मोहताज़ हो गए  तो कहाँ से अच्छे कपड़े पहनते कैसे अपना इलाज करवाते I अब जो थोड़ा बहुत मिलता भी है उससे  बच्चों की लिखाई,पढाई  करवाते उनका पेट पालते ,घर चलाते या अपना इलाज I  किसके सहारे अपने कपड़े अपनी हालत सुधारते I
मैंने पूछा भाभी जी कहाँ है ..? तो उसने  रुआंसे  स्वर में  जवाव दिया यार  अब मैं तो अपनीं मजबूरियों अपनी  हालत के चलते कभी उसके लिए कुछ कर नहीं पाया.... कल उसकी किट्टी निकली थी  पच्चीस हज़ार की.....तो  आज वह उन पैसों से अपने कान के लिए सोने के टॉप्स खरीदने गई है  I मैं हैरानी से कभी उसके फटे कपड़े और कभी उसकी मरियल सी हालत निहार रहा था और मन ही मन यह सोच रहा था की सोना तो आजकल एक तोला तीस हज़ार रुपए से भी ऊपर है अब पच्चीस हज़ार में  कपड़े लत्ते ,इलाज और घर के छोटे छोटे  कई ज़रूरी काम तो कई निकल जाते लेकिन  एक तोले से भी कम सोने के टॉप्स   से होगा क्या और यह दोनों  कानों में दिखेंगे भी क्या ........................? यह तो ऊँट के मुँह में जीरा वाली कहावत चरितार्थ होती दिखती है I      

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Comment by Deepak Sharma Kuluvi on September 4, 2017 at 1:50pm

आप सबका शुक्रिया जी 

Comment by Deepak Sharma Kuluvi on October 5, 2012 at 9:46am

शुक्रिया प्राची जी,रेखा जी

अफ़सोस केवल यही है की यह सत्य धटना मेरे एक अजीज़ दोस्त की है जो मुझे दिल-ओ जान से प्यारा है लेकिन मैं मूक दर्शक बना देखता,सहता हूँ  
दीपक 

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 4, 2012 at 8:48pm

तभी तो बड़े लोग कहते थे की जितनी चादर है उतने पैर पसारोगे तो जिन्दगी में मार नहीं खाओगे आपकी इस कहानी को पढ़कर ये कहावत बरबस ही याद आ गई एक सीख देने वाली कहानी बधाई आपको


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 4, 2012 at 6:20pm

बहुत सुन्दर यथार्थ चित्रण किया है इस कहानी में...

परिवार की आय का सदुपयोग या दुरूपयोग ही आर्थिक तरक्की का आधार होता है. इंसान पैसा कमाने से धनवान  नहीं, बल्कि उसके सद्संचय से धनवान बनता है.

कई बार स्त्रियों की भी इतनी फरमाइशें होती हैं की बेचारा पुरुष उनको पूरा ना कर पाने की कुंठा में हीनता ग्रस्त हो जाता है. 

दिखावे की जिस अंधी दौड़ में इंसान भाग रहा है, कई बार तो पुरुषों को कमाई के गलत साधनों को अपनाना पढता है, ताकि वो अपनी पत्नियों के कई शौको को पूरा कर सकें... जो बहुत ही गलत है, और जिसके परिणाम कई बार बहुत गलत होते हैं, कई परिवार तो खोखले दिखावों के चलते सड़क पर ही आ जाते है, ऐसे उदाहरण भी समाज में व्याप्त हैं...

इन सब पीडाओं को, लोभ-दिखावे की इस विद्रूपता को दर्शाती सुन्दर कहानी के लिए हार्दिक बधाई आ. दीपक शर्मा जी.

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