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नवगीत: --- संजीव 'सलिल'

नव गीत

संजीव 'सलिल'

मौन देखकर
यह मत समझो,
मुंह में नहीं जुबान...

शांति-शिष्ट,
चिर नवीनता,
जीवन की पहचान.
शांत सतह के
नीचे हलचल
मचल रहे अरमान.
श्याम-श्वेत लख,
यह मत समझो
रंगों से अनजान...

ऊपर-नीचे
हैं हम लेकिन
ऊँच-नीच से दूर.
दूर गगन पर
नजर गड़ाये
आशा से भरपूर.
मुस्कानों से
कर न सकोगे
पीड़ा का अनुमान...

ले-दे बढ़ते,
ऊपर चढ़ते,
पा लेते हैं जीत.
मिला ताल से
ताल सुनाते
सदा सफलता-गीत.
प्यार मित्र है,
नफरत दुश्मन
झुके समय बलवान...

************************

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Comment

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Comment by sanjiv verma 'salil' on November 6, 2010 at 9:38pm
dhanyavad.... मुक्तिका :
उपहार सुदीपों का...
संजीव 'सलिल'
*
सारा जग पाये उपहार सुदीपोंका.
हर घर को भाये सिंगार सुदीपोंका..

रजनीचर से विहँस प्रभाकर गले मिले-
तारागण करते सत्कार सुदीपोंका..

जीते जी तम को न फैलने देते हैं
हम सब पर कितना उपकार सुदीपोंका..

जो माटी से जुडी हुई हैं झोपड़ियाँ.
उनके जीवन को आधार सुदीपोंका..

रखकर दिल में आग, अधर पर हास रखें.
'सलिल' सीख जीवन-व्यवहार सुदीपोंका..

*****************

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 5, 2010 at 8:07pm
ले-दे बढ़ते,
ऊपर चढ़ते,
पा लेते हैं जीत.
मिला ताल से
ताल सुनाते
सदा सफलता-गीत.

बहुत खूब आचार्य जी, आपने एक बहुत ही गहरी बात कही है, तीखा चोट है, समझ सको तो समझ वाली शैली मे | दीपावली की हार्दिक शुभकामना |

कृपया ध्यान दे...

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