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दुनिया को मेरा जुर्म बता क्यूं नहीं देते?
मुजरिम हूँ तो फिर मुझको सज़ा क्यूं नहीं देते..?

बतला नहीं सकते अगर दुनिया को मेरा जुर्म?
इल्जाम नया मुझपे लगा क्यूं नहीं देते...!

मुश्किल मेरी आसान बना क्यूं नहीं देते ?
थोड़ी सी जहर मुझको पिला क्यूं नहीं देते ?

दिल में जनूं की आग जला क्यूं नहीं लेते ?
इन शोअलों को कुछ और हवा क्यूं नहीं देते ?

यूं तो बहुत कुछ अपने इजाद किया है,
इंसान को इन्सान बना क्यूं नहीं देते ?

दुनिया को असल बात बता क्यूं नहीं देते !
लफ़्ज़ों की करामात दिखा क्यूं नहीं देते !

ज़ुल्मों की दास्तान सुना क्यूं नहीं देते !
कलमों से इक तुफान उठा क्यूं नहीं देते !

ज़ालिम का हर नकाब उठा क्यूं नहीं देते...?
लोगों को उसकी शक्ल दिखा क्यूं नहीं देते.....?

--रेक्टर कथूरिया (लुधियाना...पंजाब)

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Comment by asha pandey ojha on December 7, 2010 at 10:51am
दिल में जनूं की आग जला क्यूं नहीं लेते ?
इन शोअलों को कुछ और हवा क्यूं नहीं देते ?

यूं तो बहुत कुछ अपने इजाद किया है,
इंसान को इन्सान बना क्यूं नहीं देते ?वाह जी बहुत कमाल ... बहुत गज़ब
Comment by daanish on December 2, 2010 at 7:03pm
दुनिया को मेरा जुर्म बता क्यूं नहीं देते?
मुजरिम हूँ तो फिर मुझको सज़ा क्यूं नहीं देते..?

हुज़ूर... मतला ही अपनी बात खुद कह रहा है ... वाह !
और
यूं तो बहुत कुछ अपने इजाद किया है,
इंसान को इन्सान बना क्यूं नहीं देते ?
एक अपनी ही तरह का लाजवाब शेर ... कमाल

एक भरपूर ग़ज़ल पर मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं .

'daanish' bhaarti

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 14, 2010 at 8:30am
बहुत खूब
यूं तो बहुत कुछ अपने इजाद किया है,
इंसान को इन्सान बना क्यूं नहीं देते ?
ये एक शेर १०० शेरों के बराबर , बधाई हो|
Comment by विवेक मिश्र on November 11, 2010 at 1:50pm
यूं तो बहुत कुछ आपने ईजाद किया है,
इंसान को इन्सान बना क्यूं नहीं देते ?
-बहुत खूब. ख्याल अच्छा है. बधाईयाँ.
Comment by Rector Kathuria on November 11, 2010 at 10:05am
कृपया यूं पढ़ें...:

दुनिया को असल बात बता क्यूं नहीं देते !
लफ़्ज़ों की करामात दिखा क्यूं नहीं देते !

ज़ुल्मों की दास्तान सुना क्यूं नहीं देते !
कलमों से इक तुफान उठा क्यूं नहीं देते !

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