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ये बहारें ये फिजा सौगात तेरी आ गयी है

चांद ने घूंघट उतारा बात तेरी आ गयी है

 

याद आई, तू न आया, क्या गिला करना किसी से

रात भर आंसू बहाएं बात तेरी आ गयी है

 

इन घटाओं ने न जाने कौन सा जादू किया जो

शाम ढलती ही रही इस्बात तेरी आ गयी है

 

अब सहारा ढूंढते हैं तू नहीं जो साथ मेरे

तू कहीं होता यहीं क्यूं बात तेरी आ गयी है

 

रात की तन्हाइयां भी सालती हैं अब मुझे यूं

बात कुछ होती नहीं पर बात तेरी आ गयी है

                                       - बृजेश नीरज

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Comment by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 9:33pm

वंदना जी आपकी सराहना योग्य गज़ल लिख पाया हूं तो यह ओ बी ओ की देन है और आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी की डांट का असर है।

Comment by Vindu Babu on March 13, 2013 at 9:25pm
आदरणीय सर जी...
भावनाओं को इतने लयबद्ध और सुन्दर ढंग से सजाने के लिए आपको बधाई।
Comment by बृजेश नीरज on March 12, 2013 at 7:46pm

आदरणीय राजेश जी तथा राम शिरोमणि जी, आपका आभार!

Comment by राजेश 'मृदु' on March 12, 2013 at 5:32pm

सुंदर प्रस्‍तुति ।

Comment by ram shiromani pathak on March 12, 2013 at 11:12am

आदरणीय बृजेश जी:

 

रात की तन्हाइयां भी सालती हैं अब मुझे यूं

बात कुछ होती नहीं पर बात तेरी आ गयी है!

वाह !!!
बहुत खूब 
अच्छी ग़ज़ल हुई है

Comment by बृजेश नीरज on March 12, 2013 at 5:42am

आदरणीय निकोर जी,
आपका आभार! यहां आप लोगों से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। दोहा, चैपाई और अब गजल। आप सबका मार्गदर्शन यूं ही प्राप्त होता रहे इस प्रार्थना के साथ।
सादर!

Comment by बृजेश नीरज on March 12, 2013 at 5:37am

आदरणीय वीनस जी,
यह गजल आपकी कक्षा से ही सम्भव हुई। आपका आभार!
सादर!

Comment by बृजेश नीरज on March 12, 2013 at 5:35am

आदरणीय सौरभ जी,
आपका आभार! यह आपके मार्गदर्शन से ही सम्भव हो सका। बहुत बहुत धन्यवाद!
सादर!

Comment by vijay nikore on March 12, 2013 at 4:25am

आदरणीय बृजेश जी:

 

अब सहारा ढूंढते हैं तू नहीं जो साथ मेरे

तू कहीं होता यहीं क्यूं बात तेरी आ गयी है

 

वाह, वाह, वाह!

बधाई।

 

विजय निकोर

Comment by वीनस केसरी on March 12, 2013 at 2:05am

वाह !!!
बहुत खूब
अच्छी ग़ज़ल हुई है

मतला और आख़री शेअर के लिए ढेरो ढेर दाद क़ुबूल फरमाएँ

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