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अब किसी रहनुमा की जरुरत नहीं

इस रहम इस वफ़ा की जरुरत नहीं
अब किसी रहनुमा की जरुरत नहीं

खुद मिलें ना मिलें अब मुझे रास्ते
मुझको तेरी दुआ की जरुरत नहीं

दो कदम चल के जाने कहाँ खो गया
दिल को उस गुमशुदा की जरुरत नहीं

कोई उसको भी जाके बता दे जरा
मुझको उस बेवफा की जरुरत नहीं

मेरे दामन में अब दाग ही दाग हैं
अब किसी बेख़ता की जरुरत नहीं

-पुष्यमित्र

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Comment by अरुन 'अनन्त' on March 31, 2013 at 11:40am

बेहद सुन्दर ग़ज़ल मित्रवर हार्दिक बधाई स्वीकारें


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Comment by Saurabh Pandey on March 30, 2013 at 12:04pm

भाई पुष्यमित्र जी, आपकी यह ग़ज़ल संयत और सही लगी.  हन का अंदाज़ धीरे-धीरे कसावट में है.

ग़ज़ल अच्छी लगी है. बधाई स्वीकार करें

खुद मिलें ना मिलें अब मुझे रास्ते   ...  इस मिसरे पर एक बात कहनी है कि ग़ज़लों में ’ना’ का प्रयोग करे से बचें.

Comment by coontee mukerji on March 29, 2013 at 7:52pm

पुष्यमित्र जी नाराज़गी जताने का खूब सुंदर अंदाज़ है. जीवन में ये सबकुछ होता रहता है.बस आप अपनी भावनाओं को सुंदर पंख

देते  रहिये.

Comment by बृजेश नीरज on March 29, 2013 at 8:31am

बहुत सुन्दर! मेरी बधाई स्वीकारें!

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