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बैठी देख रही थी तारे..
जाने कितने ..कितने सारे..

छोटी थी तो गिनती थी..
ढेरों सपनों को बुनती थी..
'सप्तऋषि' 'ध्रुव' ढूँढती थी..
अनोखी आकृतियों पे हँसती थी..'

अक्सर देखा करती तारे..
जाने कितने..कितने सारे..
बीता बचपन,बदले सपने..
बदला ढंग देखने का तारे..

लगता था है मुझमें ज्ञान बहुत..
हर बहस जीत खुश होती थी..
अक्सर देखा करती तारे..
अब दूर बहुत लगते सारे..
कुछ बदल गया,कुछ बीत गया..
कुछ बिखरे ,कुछ टूटे तारे..

अंजान भविष्य अजनबी डगर..
पर फिर विश्वास,साहस संजोती थी...
लगता तारे,होते हैं तारे..
बस दूर से अच्छे हैं सारे..
अब और भले से लगते हैं..जब..
'तारों' को दिखलाती हूँ तारे

वो पूछते हैं 'ध्रुव है कैसा?'
उन्हे 'सप्तऋषि'लगते प्यारे..
बाहें फैला कर कहते हैं..
माँ..देखो कितने..कितने तारे!

बैठी देख रही हूँ 'तारे'
कितने प्यारे 'मेरे तारे'


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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 25, 2010 at 9:59am
लगता तारे,होते हैं तारे..
बस दूर से अच्छे हैं सारे..
अब और भले से लगते हैं..जब..
'तारों' को दिखलाती हूँ तारे

वाह लता जी वाह, आपने दिन मे तारे दिखा दिया, वो तारे जो बचपन मे मैं भी देखता था देर देर तक और उन तारों के मध्य नई नई आकृतियाँ तलाशता था, बेहद खुबसूरत कविता और "तारों को दिखलाती तारें" पढना बहुद ही सुखद है | बेहतरीन प्रस्तुति हेतु कोटिश: धन्यवाद |

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