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एक एहसास है बाक़ी, तेरे साथ होने का..
एक डर सा कहीं ,तुझे खोने का..
एक द्वंद ,साहस और भय के बीच..
एक निर्णय,तुझ पे बोझ ना बनने का..

सांझ के धूंधलके में,एक ख्वाब सा..
तेरा साथ अपना सा,कुछ पराया सा..
चटखती,टूटती,सहमी सी प्रीत की डोर भी..
शायद..
डर है,तुझे खोने के डर के सच होने का..

सुना था,जो सच में अपना है वो लौट आता है..
जो लौटना ही हो तो क्यों जाता है?
कितने अरमानो को,एहसासों को, ख्वाबों को तोड़ देता है..
क्यों नही साथ ज़िंदगी को सज़ा पाता है ?

अजनबी...

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 27, 2010 at 4:44pm
बहुत ही सुंदर कविता कही है लता जी !

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